गुमशुदा बचपन की डोर

By Amit Kumar Pawar | 2026-02-24 | 1 min read

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रवि, अधेड़ उम्र का, भीड़ भरे हवाई अड्डे पर, हाथ में रंगीन पतंग लिए खड़ा है।

गाँव की धूप, खुले मैदान, और बाबा के साथ पतंग उड़ाने की बचपन की यादें।

हवाई अड्डे के कोने में रवि पतंग उड़ाने की कोशिश करता है, पर हवा साथ नहीं देती।

सुरक्षाकर्मी उसे रोकते हैं, नियमों का हवाला देते हैं, यात्रियों की शिकायतें बढ़ती हैं।

बाबा की डांट याद आती है, पर बचपन के आनंद को फिर से जीने का दृढ़ संकल्प है।

रवि अधिकारियों को समझाने की कोशिश करता है, यह पतंग सिर्फ खिलौना नहीं, यादों का प्रतीक है।

कुछ यात्री उसे पागल समझते हैं, कुछ उसकी मासूमियत से प्रभावित होते हैं।

नेहा, एक युवा कलाकार, रवि की कहानी सुनकर भावुक हो जाती है और मदद करने का फैसला करती है।

नेहा अधिकारियों से बात करने में मदद करती है, एक शांत जगह ढूंढती है पतंग उड़ाने के लिए।

अधिकारी परेशान होते हैं, गिरफ्तारी की धमकी देते हैं, नेहा रवि का बचाव करती है।

हवाई अड्डे की छत पर, रवि को पतंग उड़ाने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।

पतंग हवा में उड़ान भरती है, रवि खुशी से रो पड़ता है, बचपन की यादें ताज़ा हो जाती हैं।

पहले विरोध करने वाले यात्री अब तालियाँ बजाते हैं, रवि को प्रोत्साहित करते हैं।

बाबा की याद आती है, अपनी जड़ों को याद रखने का महत्व समझ आता है।

रवि हवाई अड्डे से बाहर निकलता है, चेहरे पर मुस्कान, बचपन की मासूमियत को फिर से पाकर।

About This Story

Genres: Poetry

Description: एक अधेड़ उम्र का आदमी, रवि, अपने बचपन की यादों को ताज़ा करने के लिए एक आधुनिक हवाई अड्डे पर पतंग उड़ाने की कोशिश करता है। उसकी यात्रा हमें याद दिलाती है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपनी जड़ों को याद रखना कितना ज़रूरी है।