अमरबेल का अभिशाप
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जंगल की धुंध दिल में उतरती जा रही थी। हर तरफ अमरबेल फैली हुई थी, जैसे हरे रंग का एक जाल, जो हर चीज़ को जकड़ रहा था। मुझे यह जगह बिल्कुल पसंद नहीं थी। यह जंगल, जहाँ हर पत्ती में जादू था, मेरी लत का प्रतीक बन गया था।
“यह अमरबेल...यह मेरा अभिशाप है,” मैंने फुसफुसाया। मेरी आवाज़ में दर्द था, सालों की तकलीफ़ और पछतावे का बोझ था। मैं, विक्रम, कभी एक सफल लेखक हुआ करता था। अब, मैं सिर्फ एक शराबी हूँ, जो अपनी यादों और अपनी पहचान को खो चुका है।
कल रात...कल रात क्या हुआ था? मुझे कुछ भी ठीक से याद नहीं। सिर्फ धुंधली छवियाँ, शराब की तीखी गंध, और एक खालीपन, जो मुझे अंदर से खोखला कर रहा था। मैं जंगल में क्यों आया था? शायद...शायद मुझे वो ढूँढना था जो मैंने खो दिया था। वो कुंजी, जो मेरी स्मृति को वापस ला सकती थी, और शायद, मुझे मेरी लत से भी आज़ाद कर सकती थी।
मैंने जेब टटोली। खाली। वो ताबीज़...जिसमें मेरी माँ की तस्वीर थी, और जो मेरी खोई हुई यादों का प्रतीक था...गायब था।
“नहीं! यह नहीं हो सकता!” मैं चिल्लाया। मेरी आवाज़ जंगल में गूँज उठी।
अचानक, मैंने एक आवाज़ सुनी। “विक्रम?”
मैंने देखा। एक बूढ़ी औरत, जो पेड़ की जड़ों पर बैठी थी, मुझे देख रही थी। उसकी आँखें गहरी और बुद्धिमान थीं।
“कौन हो तुम?” मैंने पूछा, मेरी आवाज़ में संदेह था।
“मैं यहाँ की रक्षक हूँ। और मैं जानती हूँ कि तुम क्या ढूँढ रहे हो।” उसने जवाब दिया।
“मेरा ताबीज़...मैंने उसे खो दिया है,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ में निराशा थी।
“अमरबेल की छाया में देखो। वहीं मिलेगा।” उसने कहा।
मैंने उसकी बात मानी। मैंने अमरबेल की घनी छाया में देखा। और वहीं, मिट्टी में आधा दबा हुआ, मुझे मेरा ताबीज़ मिला। मैंने उसे उठाया। मेरी माँ की तस्वीर को देखते ही, मेरी आँखों में आँसू आ गए।
“यह सिर्फ एक ताबीज़ नहीं है, विक्रम। यह तुम्हारी स्मृति है। यह तुम्हारी पहचान है। और यह तुम्हारी लत से आज़ादी की कुंजी भी है।” बूढ़ी औरत ने कहा।
मैंने ताबीज़ को कसकर पकड़ लिया। मुझे अचानक एहसास हुआ कि बूढ़ी औरत सही कह रही थी। मेरी लत, मेरी कमज़ोरी, मेरी स्मृति के खोने का कारण थी। मुझे इससे लड़ना होगा। मुझे अपनी पहचान वापस पानी होगी।
“मैं क्या करूँ?” मैंने पूछा, मेरी आवाज़ में उम्मीद की एक किरण थी।
“अमरबेल को काटो। इसे अपनी ज़िन्दगी से निकाल फेंको। यह आसान नहीं होगा। दर्द होगा। लेकिन तुम कर सकते हो।” उसने कहा।
मैंने एक गहरी साँस ली। मैंने अपनी जेब से चाकू निकाला। और मैंने अमरबेल को काटना शुरू कर दिया। यह आसान नहीं था। बेलें मोटी और मज़बूत थीं। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। हर बेल को काटने के साथ, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपनी लत का एक हिस्सा काट रहा हूँ।
घंटों बाद, मैंने अमरबेल को पूरी तरह से काट दिया। मैं थक गया था, लेकिन मुझे राहत महसूस हो रही थी। मैंने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।
“धन्यवाद,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ में कृतज्ञता थी।
“तुम्हें खुद को धन्यवाद देना चाहिए, विक्रम। तुमने अपनी लड़ाई खुद जीती है।” उसने जवाब दिया।
मैंने जंगल से बाहर कदम रखा। सूरज उग रहा था। और पहली बार, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सचमुच आज़ाद हूँ। मेरी लत से, मेरी यादों के बोझ से, और अमरबेल के अभिशाप से।
“यह अमरबेल...यह मेरा अभिशाप है,” मैंने फुसफुसाया। मेरी आवाज़ में दर्द था, सालों की तकलीफ़ और पछतावे का बोझ था। मैं, विक्रम, कभी एक सफल लेखक हुआ करता था। अब, मैं सिर्फ एक शराबी हूँ, जो अपनी यादों और अपनी पहचान को खो चुका है।
कल रात...कल रात क्या हुआ था? मुझे कुछ भी ठीक से याद नहीं। सिर्फ धुंधली छवियाँ, शराब की तीखी गंध, और एक खालीपन, जो मुझे अंदर से खोखला कर रहा था। मैं जंगल में क्यों आया था? शायद...शायद मुझे वो ढूँढना था जो मैंने खो दिया था। वो कुंजी, जो मेरी स्मृति को वापस ला सकती थी, और शायद, मुझे मेरी लत से भी आज़ाद कर सकती थी।
मैंने जेब टटोली। खाली। वो ताबीज़...जिसमें मेरी माँ की तस्वीर थी, और जो मेरी खोई हुई यादों का प्रतीक था...गायब था।
“नहीं! यह नहीं हो सकता!” मैं चिल्लाया। मेरी आवाज़ जंगल में गूँज उठी।
अचानक, मैंने एक आवाज़ सुनी। “विक्रम?”
मैंने देखा। एक बूढ़ी औरत, जो पेड़ की जड़ों पर बैठी थी, मुझे देख रही थी। उसकी आँखें गहरी और बुद्धिमान थीं।
“कौन हो तुम?” मैंने पूछा, मेरी आवाज़ में संदेह था।
“मैं यहाँ की रक्षक हूँ। और मैं जानती हूँ कि तुम क्या ढूँढ रहे हो।” उसने जवाब दिया।
“मेरा ताबीज़...मैंने उसे खो दिया है,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ में निराशा थी।
“अमरबेल की छाया में देखो। वहीं मिलेगा।” उसने कहा।
मैंने उसकी बात मानी। मैंने अमरबेल की घनी छाया में देखा। और वहीं, मिट्टी में आधा दबा हुआ, मुझे मेरा ताबीज़ मिला। मैंने उसे उठाया। मेरी माँ की तस्वीर को देखते ही, मेरी आँखों में आँसू आ गए।
“यह सिर्फ एक ताबीज़ नहीं है, विक्रम। यह तुम्हारी स्मृति है। यह तुम्हारी पहचान है। और यह तुम्हारी लत से आज़ादी की कुंजी भी है।” बूढ़ी औरत ने कहा।
मैंने ताबीज़ को कसकर पकड़ लिया। मुझे अचानक एहसास हुआ कि बूढ़ी औरत सही कह रही थी। मेरी लत, मेरी कमज़ोरी, मेरी स्मृति के खोने का कारण थी। मुझे इससे लड़ना होगा। मुझे अपनी पहचान वापस पानी होगी।
“मैं क्या करूँ?” मैंने पूछा, मेरी आवाज़ में उम्मीद की एक किरण थी।
“अमरबेल को काटो। इसे अपनी ज़िन्दगी से निकाल फेंको। यह आसान नहीं होगा। दर्द होगा। लेकिन तुम कर सकते हो।” उसने कहा।
मैंने एक गहरी साँस ली। मैंने अपनी जेब से चाकू निकाला। और मैंने अमरबेल को काटना शुरू कर दिया। यह आसान नहीं था। बेलें मोटी और मज़बूत थीं। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। हर बेल को काटने के साथ, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपनी लत का एक हिस्सा काट रहा हूँ।
घंटों बाद, मैंने अमरबेल को पूरी तरह से काट दिया। मैं थक गया था, लेकिन मुझे राहत महसूस हो रही थी। मैंने बूढ़ी औरत की तरफ देखा।
“धन्यवाद,” मैंने कहा, मेरी आवाज़ में कृतज्ञता थी।
“तुम्हें खुद को धन्यवाद देना चाहिए, विक्रम। तुमने अपनी लड़ाई खुद जीती है।” उसने जवाब दिया।
मैंने जंगल से बाहर कदम रखा। सूरज उग रहा था। और पहली बार, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं सचमुच आज़ाद हूँ। मेरी लत से, मेरी यादों के बोझ से, और अमरबेल के अभिशाप से।
About This Story
Genres: Drama
Description: एक नशे से जूझता व्यक्ति, जादूई जंगल में अपनी खोई हुई स्मृति की कुंजी ढूंढता है, जिससे उसे अपनी लत से मुक्ति मिल सके।