बरगद की छाँव में दोपहर (Bargad Ki Chhaon Mein Dopahar - An Afternoon in the Shade of the Banyan Tree)

By Amit Kumar Pawar | 2026-01-29 | 1 min read

Story Content

बरगद की छाँव में दोपहर, कैसी सुहानी थी,
धूप छनकर आती थी, एक अद्भुत कहानी थी।
मिट्टी के घरौंदे, कागज़ की नाव बनाते,
बारिश की बूंदों में, हम ख़ुशी मनाते।

वो कच्ची अमियाँ, नमक संग खाना,
दादी की कहानियाँ, रात भर सुनना-सुनाना।
बस्ते का बोझ नहीं, फ़िक्र का नाम न था,
बस खेलना-कूदना, यही तो काम था।

कहाँ खो गया वो बचपन, वो बेफिक्री का आलम,
ज़िन्दगी की दौड़ में, अब तो बस है एक मातम।
वो दोस्त, वो यारी, सब छूट गए पीछे,
वक़्त के थपेड़ों ने, रिश्ते भी दिए खींचे।

अब तो बस यादें हैं, उन लम्हों की,
दिल में छुपी एक कसक है, अपनों की।
काश! लौट पाता मैं, उस बचपन की गली में,
फिर से जी पाता वो ज़िन्दगी, बरगद की छाँव में।

अब ये शहर की धूप, झुलसाती है तन-मन,
कहाँ वो ठंडी छाँव, कहाँ वो निर्मल पवन।
ये भागदौड़ भरी ज़िन्दगी, ले आई कहाँ मुझको,
खो गया हूँ मैं कहीं, ढूंढता हूँ खुद को।

वो कागज़ की कश्ती, अब भी याद आती है,
बारिश की बूंदों में, वो मस्ती याद आती है।
वो बेपरवाह हँसी, वो खिलखिलाता चेहरा,
सब कुछ तो था मेरा, अब है बस अंधेरा।

कभी-कभी सोचता हूँ, क्या पाया मैंने खोकर,
बचपन की वो खुशियाँ, इस दुनिया में आकर।
ये दौलत, ये शोहरत, सब हैं बेकार,
बचपन की वो सादगी, थी सबसे बेशकीमती यार।

वो बरगद अब भी होगा, वहीं खड़ा,
शायद इंतज़ार कर रहा होगा, मेरा।
मैं ही तो बदल गया, इस शहर में आकर,
खो दिया वो बचपन, खुद को भुलाकर।

एक बार फिर जाना है, उस गाँव की ओर,
देखना है उस बरगद को, जी भर के एक बार और।
शायद मिल जाए मुझे, मेरा खोया हुआ बचपन,
उस मिट्टी में, उस छाँव में, उस निर्मल पवन।

शायद फिर से बन जाऊँ, वही नादान बच्चा,
भूल जाऊँ ये गम, ये दर्द, ये सब कुछ कच्चा।
बस जी लूँ वो पल, वो बचपन का हर लम्हा,
बरगद की छाँव में, सुकून से रहूँ हमेशा।

ये ज़िन्दगी की आपाधापी, थका देती है मुझको,
वो बचपन की यादें, सहारा देती हैं मुझको।
एक उम्मीद है दिल में, कि सब ठीक हो जाएगा,
वो बचपन फिर से, मेरे जीवन में आएगा।

बस एक बार, उस बरगद की छाँव में,
बैठकर रोना है जी भर के, उस बचपन की याद में।
फिर शायद मिल जाए, उस खोई हुई हँसी का पता,
फिर जी सकूँ मैं, वो ज़िन्दगी बेफिक्रा।

About This Story

Genres: Poetry

Description: A sonnet reflecting on the simple joys and carefree spirit of childhood spent under the shade of an old banyan tree, evoking a sense of longing and bittersweet nostalgia.