ऋतु-परिवर्तन: मन का दर्पण
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पतझड़ की उदासी, मन में छाई है,
पेड़ों से बिछड़े पत्तों की याद आई है।
सूखी टहनियाँ, ठंडी हवा का शोर,
जैसे जीवन की कहानी, लिखी हो हर ओर।
कभी थी हरियाली, रंगो का मेला,
अब है सिर्फ़ ख़ामोशी, अकेलापन गहरा।
दिल में दबी है, एक अनकही बात,
जैसे ऋतुओं के संग, बदल रहे हैं हालात।
सर्दी की दस्तक, कंपकंपाती रातें,
आग के सहारे, गुज़रती हैं बातें।
चाय की चुस्की, यादों का सफर,
बचपन की गलियाँ, माँ का प्यार अमर।
धुंध में लिपटी, सुबह की किरणें,
खोई हुई राहें, धुंधली सी दिखती हैं।
जैसे भविष्य की चिंता, मन को घेरे,
अतीत की यादें, आँसुओं में बिखरे।
फिर आती है वसंत, नई उम्मीद लेकर,
फूलों की खुशबू, मन को बहका कर।
कोयल की कूक, हवा का झोंका,
जैसे जीवन में फिर से, आया हो मौका।
नई कोंपलें, नई उमंगें,
पुरानी यादों को, दिल में समेटे।
प्यार का एहसास, रिश्तों की डोर,
जैसे प्रकृति ने खुद, दिया हो ये जोर।
गर्मी की तपिश, धूप का तेज,
दिन लंबे, रातें छोटी, जीवन का लेखा।
पसीने से तर, मेहनत का फल,
जैसे कर्मों का हिसाब, यही है अटल।
नदी किनारे, शाम की ठंडी हवा,
दोस्तों की महफ़िल, हँसी का समाँ।
जीवन की आपाधापी, थोड़ी सी राहत,
जैसे थकान मिटाने का, मिला हो अवसर।
फिर आती है बरसात, रिमझिम फुहार,
मिट्टी की सौंधी खुशबू, मन में बहार।
कागज़ की नाव, पानी में तैराना,
जैसे बचपन के दिनों को, फिर से पाना।
इंद्रधनुष का रंग, आशा की किरण,
जैसे हर मुश्किल के बाद, मिले सुकून।
ऋतुएँ बदलती हैं, जीवन चलता है,
हर पल एक नया अनुभव, मिलता है।
कभी खुशी, कभी गम,
यही है जीवन का क्रम।
पर हर ऋतु में, एक सीख छिपी है,
जैसे प्रकृति ने खुद, कोई बात कही है।
पतझड़ सिखाता है, त्याग और विदाई,
सर्दी सिखाती है, सहनशीलता और गहराई।
वसंत सिखाता है, नई शुरुआत और प्यार,
गर्मी सिखाती है, मेहनत और संसार।
बरसात सिखाती है, प्रेम और त्याग,
और इंद्रधनुष सिखाता है, आशा का अनुराग।
हर ऋतु का अपना रंग, अपना अंदाज़,
जैसे जीवन के हर पल में, छिपा है कोई राज़।
मन का दर्पण, ऋतुओं का खेल,
हर बदलाव में, जीवन का मेल।
इसलिए हर ऋतु को, दिल से अपनाओ,
और जीवन के हर रंग को, खुशी से मनाओ।
समय की धारा, बहती जाएगी,
ऋतुएँ बदलती रहेंगी, यादें बन जाएँगी।
पर दिल में रहेगा, एक अनोखा एहसास,
जैसे प्रकृति ने खुद, दिया हो ये प्रकाश।
पेड़ों से बिछड़े पत्तों की याद आई है।
सूखी टहनियाँ, ठंडी हवा का शोर,
जैसे जीवन की कहानी, लिखी हो हर ओर।
कभी थी हरियाली, रंगो का मेला,
अब है सिर्फ़ ख़ामोशी, अकेलापन गहरा।
दिल में दबी है, एक अनकही बात,
जैसे ऋतुओं के संग, बदल रहे हैं हालात।
सर्दी की दस्तक, कंपकंपाती रातें,
आग के सहारे, गुज़रती हैं बातें।
चाय की चुस्की, यादों का सफर,
बचपन की गलियाँ, माँ का प्यार अमर।
धुंध में लिपटी, सुबह की किरणें,
खोई हुई राहें, धुंधली सी दिखती हैं।
जैसे भविष्य की चिंता, मन को घेरे,
अतीत की यादें, आँसुओं में बिखरे।
फिर आती है वसंत, नई उम्मीद लेकर,
फूलों की खुशबू, मन को बहका कर।
कोयल की कूक, हवा का झोंका,
जैसे जीवन में फिर से, आया हो मौका।
नई कोंपलें, नई उमंगें,
पुरानी यादों को, दिल में समेटे।
प्यार का एहसास, रिश्तों की डोर,
जैसे प्रकृति ने खुद, दिया हो ये जोर।
गर्मी की तपिश, धूप का तेज,
दिन लंबे, रातें छोटी, जीवन का लेखा।
पसीने से तर, मेहनत का फल,
जैसे कर्मों का हिसाब, यही है अटल।
नदी किनारे, शाम की ठंडी हवा,
दोस्तों की महफ़िल, हँसी का समाँ।
जीवन की आपाधापी, थोड़ी सी राहत,
जैसे थकान मिटाने का, मिला हो अवसर।
फिर आती है बरसात, रिमझिम फुहार,
मिट्टी की सौंधी खुशबू, मन में बहार।
कागज़ की नाव, पानी में तैराना,
जैसे बचपन के दिनों को, फिर से पाना।
इंद्रधनुष का रंग, आशा की किरण,
जैसे हर मुश्किल के बाद, मिले सुकून।
ऋतुएँ बदलती हैं, जीवन चलता है,
हर पल एक नया अनुभव, मिलता है।
कभी खुशी, कभी गम,
यही है जीवन का क्रम।
पर हर ऋतु में, एक सीख छिपी है,
जैसे प्रकृति ने खुद, कोई बात कही है।
पतझड़ सिखाता है, त्याग और विदाई,
सर्दी सिखाती है, सहनशीलता और गहराई।
वसंत सिखाता है, नई शुरुआत और प्यार,
गर्मी सिखाती है, मेहनत और संसार।
बरसात सिखाती है, प्रेम और त्याग,
और इंद्रधनुष सिखाता है, आशा का अनुराग।
हर ऋतु का अपना रंग, अपना अंदाज़,
जैसे जीवन के हर पल में, छिपा है कोई राज़।
मन का दर्पण, ऋतुओं का खेल,
हर बदलाव में, जीवन का मेल।
इसलिए हर ऋतु को, दिल से अपनाओ,
और जीवन के हर रंग को, खुशी से मनाओ।
समय की धारा, बहती जाएगी,
ऋतुएँ बदलती रहेंगी, यादें बन जाएँगी।
पर दिल में रहेगा, एक अनोखा एहसास,
जैसे प्रकृति ने खुद, दिया हो ये प्रकाश।
About This Story
Genres: Poetry
Description: A lyrical poem reflecting on the changing seasons and how they mirror the speaker's evolving emotions and experiences through life's journey.