धूल और धड़कन (Dhool Aur Dhadkan)
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धूल थी हर तरफ। इतनी कि सांस लेना भी मुश्किल था। ये शहर… ये कभी मेरा घर हुआ करता था। अब बस खंडहर है। हर इमारत एक चीख की तरह खड़ी है, उस दर्द की गवाह जो कभी खत्म नहीं होगा। मैं अक्सर यहाँ आती हूँ, इस उम्मीद में कि शायद कुछ मिल जाए… कुछ ऐसा जो मुझे याद दिलाए कि मैं कौन थी, इससे पहले कि सब कुछ तबाह हो जाए।
आज भी आई थी। सूरज डूब रहा था, और आसमान में लाल और नारंगी रंग घुल रहे थे, जैसे खून और आग का मिश्रण हो। मैं एक टूटी हुई दीवार के सहारे बैठी थी, अपनी उंगलियों से ज़मीन पर कुछ आकृतियाँ बना रही थी।
तभी मैंने उसे देखा। वो दूर खड़ा था, एक लड़का… या शायद आदमी। उसकी पीठ मेरी तरफ थी, और वो भी आसमान की तरफ देख रहा था। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसकी पीठ सीधी थी, जैसे वो किसी उम्मीद को पकड़े हुए हो। अजीब बात है, यहाँ तो अब उम्मीद की कोई जगह ही नहीं बची है।
वो धीरे-धीरे मेरी तरफ मुड़ा। उसकी आँखें… मैंने ऐसी आँखें पहले कभी नहीं देखी थीं। उनमें दर्द था, हाँ, दर्द तो हम सब में है। लेकिन उसके साथ कुछ और भी था… एक तरह की शांति, एक समझदारी जो उम्र से परे थी।
"नमस्ते," उसने कहा, उसकी आवाज़ धीमी और थोड़ी सी खुरदरी थी।
मैंने धीरे से जवाब दिया, "नमस्ते।"
"मैं यहाँ अक्सर आता हूँ," उसने कहा, मेरे पास आकर बैठते हुए। "मुझे यहाँ शांति मिलती है।"
शांति? इस जगह में? मैंने सोचा। "मुझे तो यहाँ बस दर्द दिखता है।"
उसने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों में थोड़ी सी सहानुभूति थी। "दर्द है, हाँ। लेकिन दर्द के साथ यादें भी तो हैं। और यादें ही तो हमें ज़िंदा रखती हैं।"
हम दोनों कुछ देर चुप रहे। सूरज पूरी तरह से डूब चुका था, और आसमान में तारे निकलने लगे थे। वो तारे… वो हमेशा से यहीं थे, इस तबाही से पहले भी। क्या उन्हें भी दर्द महसूस होता होगा?
"मेरा नाम विक्रम है," उसने कहा, चुप्पी तोड़ते हुए।
"मैं… मैं अदिति हूँ।"
"अदिति," उसने नाम दोहराया, जैसे उसे चख रहा हो। "सुंदर नाम है।"
मैंने थोड़ा सा मुस्कुराने की कोशिश की। "धन्यवाद।"
हमने उस रात बहुत बातें कीं। उसने मुझे बताया कि वो एक चित्रकार है, और वो इस शहर की तबाही को कैनवस पर उतारना चाहता है, ताकि लोग कभी न भूलें कि युद्ध कितना भयानक होता है। मैंने उसे बताया कि मैं एक शिक्षिका थी, और मेरा सपना था कि मैं बच्चों को पढ़ाऊँ, उन्हें एक बेहतर भविष्य की उम्मीद दिलाऊँ।
जैसे-जैसे रात बीतती गई, मुझे लगने लगा कि मैं उसे बहुत पहले से जानती हूँ। जैसे हमारी आत्माएँ पहले भी कहीं मिली हों, और अब बस फिर से एक-दूसरे को ढूंढ रही हों।
उसने मुझसे पूछा, "क्या तुम्हें लगता है कि हम कभी खुश रह पाएँगे? इस सब के बाद?"
मैंने उसकी आँखों में देखा, और मुझे लगा कि शायद… शायद हाँ। शायद हम दर्द को पीछे छोड़ सकते हैं, और एक नई शुरुआत कर सकते हैं। शायद हम एक-दूसरे के लिए उम्मीद बन सकते हैं।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा, "लेकिन मुझे लगता है कि अगर हम साथ हैं, तो शायद हम कुछ भी कर सकते हैं।"
उसने मेरा हाथ पकड़ा, और उसकी उंगलियाँ मेरी उंगलियों में उलझ गईं। उसकी छुअन गर्म थी, और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं घर वापस आ गई हूँ।
धूल और दर्द के बीच, हमने एक-दूसरे को पाया था। और शायद… शायद यही हमारी किस्मत थी। शायद हम दोनों इस तबाही से निकलने के लिए ही बने थे, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, एक नई शुरुआत की उम्मीद में।
अगली सुबह, जब सूरज निकला, तो मैंने विक्रम के साथ उस खंडहर से बाहर कदम रखा। शहर अभी भी तबाह था, लेकिन मेरे दिल में एक नई उम्मीद थी। और मुझे पता था कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अकेले नहीं हैं। हम साथ हैं, और साथ मिलकर, हम सब कुछ सह सकते हैं।
आज भी आई थी। सूरज डूब रहा था, और आसमान में लाल और नारंगी रंग घुल रहे थे, जैसे खून और आग का मिश्रण हो। मैं एक टूटी हुई दीवार के सहारे बैठी थी, अपनी उंगलियों से ज़मीन पर कुछ आकृतियाँ बना रही थी।
तभी मैंने उसे देखा। वो दूर खड़ा था, एक लड़का… या शायद आदमी। उसकी पीठ मेरी तरफ थी, और वो भी आसमान की तरफ देख रहा था। उसके बाल हवा में उड़ रहे थे, और उसकी पीठ सीधी थी, जैसे वो किसी उम्मीद को पकड़े हुए हो। अजीब बात है, यहाँ तो अब उम्मीद की कोई जगह ही नहीं बची है।
वो धीरे-धीरे मेरी तरफ मुड़ा। उसकी आँखें… मैंने ऐसी आँखें पहले कभी नहीं देखी थीं। उनमें दर्द था, हाँ, दर्द तो हम सब में है। लेकिन उसके साथ कुछ और भी था… एक तरह की शांति, एक समझदारी जो उम्र से परे थी।
"नमस्ते," उसने कहा, उसकी आवाज़ धीमी और थोड़ी सी खुरदरी थी।
मैंने धीरे से जवाब दिया, "नमस्ते।"
"मैं यहाँ अक्सर आता हूँ," उसने कहा, मेरे पास आकर बैठते हुए। "मुझे यहाँ शांति मिलती है।"
शांति? इस जगह में? मैंने सोचा। "मुझे तो यहाँ बस दर्द दिखता है।"
उसने मेरी तरफ देखा, उसकी आँखों में थोड़ी सी सहानुभूति थी। "दर्द है, हाँ। लेकिन दर्द के साथ यादें भी तो हैं। और यादें ही तो हमें ज़िंदा रखती हैं।"
हम दोनों कुछ देर चुप रहे। सूरज पूरी तरह से डूब चुका था, और आसमान में तारे निकलने लगे थे। वो तारे… वो हमेशा से यहीं थे, इस तबाही से पहले भी। क्या उन्हें भी दर्द महसूस होता होगा?
"मेरा नाम विक्रम है," उसने कहा, चुप्पी तोड़ते हुए।
"मैं… मैं अदिति हूँ।"
"अदिति," उसने नाम दोहराया, जैसे उसे चख रहा हो। "सुंदर नाम है।"
मैंने थोड़ा सा मुस्कुराने की कोशिश की। "धन्यवाद।"
हमने उस रात बहुत बातें कीं। उसने मुझे बताया कि वो एक चित्रकार है, और वो इस शहर की तबाही को कैनवस पर उतारना चाहता है, ताकि लोग कभी न भूलें कि युद्ध कितना भयानक होता है। मैंने उसे बताया कि मैं एक शिक्षिका थी, और मेरा सपना था कि मैं बच्चों को पढ़ाऊँ, उन्हें एक बेहतर भविष्य की उम्मीद दिलाऊँ।
जैसे-जैसे रात बीतती गई, मुझे लगने लगा कि मैं उसे बहुत पहले से जानती हूँ। जैसे हमारी आत्माएँ पहले भी कहीं मिली हों, और अब बस फिर से एक-दूसरे को ढूंढ रही हों।
उसने मुझसे पूछा, "क्या तुम्हें लगता है कि हम कभी खुश रह पाएँगे? इस सब के बाद?"
मैंने उसकी आँखों में देखा, और मुझे लगा कि शायद… शायद हाँ। शायद हम दर्द को पीछे छोड़ सकते हैं, और एक नई शुरुआत कर सकते हैं। शायद हम एक-दूसरे के लिए उम्मीद बन सकते हैं।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा, "लेकिन मुझे लगता है कि अगर हम साथ हैं, तो शायद हम कुछ भी कर सकते हैं।"
उसने मेरा हाथ पकड़ा, और उसकी उंगलियाँ मेरी उंगलियों में उलझ गईं। उसकी छुअन गर्म थी, और मुझे ऐसा लगा जैसे मैं घर वापस आ गई हूँ।
धूल और दर्द के बीच, हमने एक-दूसरे को पाया था। और शायद… शायद यही हमारी किस्मत थी। शायद हम दोनों इस तबाही से निकलने के लिए ही बने थे, एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, एक नई शुरुआत की उम्मीद में।
अगली सुबह, जब सूरज निकला, तो मैंने विक्रम के साथ उस खंडहर से बाहर कदम रखा। शहर अभी भी तबाह था, लेकिन मेरे दिल में एक नई उम्मीद थी। और मुझे पता था कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम अकेले नहीं हैं। हम साथ हैं, और साथ मिलकर, हम सब कुछ सह सकते हैं।
About This Story
Genres: Romance
Description: In the skeletal remains of a war-torn city, a woman wrestling with survivor's guilt encounters a man who sees beyond the wreckage, awakening a dormant hope and a connection that feels both inevitable and impossible.