पहाड़ी राग

By Amit Kumar Pawar | 2026-02-04 | 2 min read

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धूल भरी पगडंडी पर नंगे पैर चलते हुए, सूरज की किरणें मेरी आँखों में चुभ रही थीं। गाँव, जो मेरी दुनिया था, आज एक पिंजरे की तरह लग रहा था। हर साल, बसंत ऋतु में, पहाड़ियाँ खिलखिला उठती थीं, पर इस बार, मेरे दिल में एक अजीब सी उदासी थी। मैं, तेरह साल का अर्जुन, अपनी ज़िंदगी के चौराहे पर खड़ा था।

घर पहुँचते ही, माँ ने डाँटा, "कहाँ भटक रहा था? पंडित जी कब से तेरा इंतज़ार कर रहे हैं।" पंडित जी... मेरे भविष्य के निर्माता। वो मुझे संस्कृत पढ़ाते थे, ताकि मैं बड़ा होकर गाँव का पुजारी बन सकूँ। पर मेरा मन तो कहीं और ही था। मैं दूर शहरों के बारे में सोचता था, जहाँ गाड़ियाँ दौड़ती हैं और आसमान छूती इमारतें हैं।

पंडित जी ने मुझे देखा और मुस्कुराए, "अर्जुन, ध्यान लगाओ। ये ज्ञान तुम्हें जीवन में मार्गदर्शन देगा।" मैं सिर हिलाकर बैठ गया, पर मेरा मन भटक रहा था। पंडित जी की आवाज़ एक दूर की गूँज की तरह लग रही थी।

शाम को, मैं नदी किनारे बैठा था। पानी में चाँद का अक्स काँप रहा था। तभी मेरा दोस्त, विक्रम, आया। "अर्जुन, सुना है इस बार शहर से कुछ लोग आए हैं। वो यहाँ एक पुल बनाना चाहते हैं।" विक्रम की आँखों में चमक थी।

"पुल?" मैंने पूछा, "शहर से यहाँ?" मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

"हाँ! वो लोग कहते हैं कि पुल बनने से गाँव का विकास होगा। हमें भी नौकरी मिल सकती है।" विक्रम ने कहा।

उस रात, मैं सो नहीं पाया। शहर... विकास... नौकरी... ये शब्द मेरे दिमाग में घूम रहे थे। क्या यही मेरा भविष्य था? क्या मुझे पंडित बनना था, या मैं कुछ और भी कर सकता था?

अगले दिन, मैंने शहर से आए लोगों को देखा। वो आधुनिक मशीनों के साथ काम कर रहे थे। उनमें से एक आदमी ने मुझे देखा और पूछा, "क्या नाम है तुम्हारा?"

"अर्जुन," मैंने कहा।

"तुम पढ़ना-लिखना जानते हो?" उन्होंने पूछा।

"हाँ, पंडित जी मुझे पढ़ाते हैं," मैंने जवाब दिया।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "अगर तुम सीखना चाहो, तो हम तुम्हें काम सिखा सकते हैं।" ये सुनकर, मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। ये वही अवसर था, जिसका मैं इंतज़ार कर रहा था।

पर घर पर माँ और पिताजी को कैसे समझाऊँगा? वो तो चाहते थे कि मैं पुजारी बनूँ। मैंने डरते-डरते पिताजी को बताया। उन्होंने मेरी बात सुनकर गहरी साँस ली। "अर्जुन, ये हमारा खानदानी काम है। हम पीढ़ियों से भगवान की सेवा करते आए हैं। तुम कैसे इनकार कर सकते हो?" उनकी आवाज़ में दुख था।

"पर पिताजी, मैं... मैं कुछ और करना चाहता हूँ।" मैंने कहा, "मैं गाँव को आगे बढ़ाना चाहता हूँ।"

उन्होंने कहा, "गाँव को आगे बढ़ाने के लिए पुजारी बनना ज़रूरी है, अर्जुन। ज्ञान और धर्म से ही विकास होता है।"

यह सुनकर मेरा दिल टूट गया। मैं जानता था कि मैं उन्हें निराश कर रहा हूँ, पर मैं अपनी इच्छाओं को दबा नहीं सकता था। यह लड़ाई बाहर की नहीं, खुद के भीतर की थी। मुझे अपने परिवार की उम्मीदों और अपनी इच्छाओं के बीच चुनाव करना था।

मैंने चुप रहने का फैसला किया, पर मेरे दिल में एक तूफान उठ रहा था। मुझे पता था कि मुझे एक रास्ता खोजना होगा, एक ऐसा रास्ता जो मेरे परिवार को खुश रखे और मुझे अपनी मंज़िल तक पहुंचाए। शायद, मैं पंडित भी बन सकता था और गाँव के विकास में भी योगदान दे सकता था। यह आसान नहीं होगा, पर मैं कोशिश करने के लिए तैयार था। पहाड़ी राग, जो मेरे भीतर बज रहा था, अब एक नई धुन की तलाश में था।

About This Story

Genres: Drama

Description: In a remote Himalayan village, a young boy grapples with the stifling expectations of his family and the intoxicating call of a life beyond the mountains, forcing him to confront his own desires and fears.