कांक्रीट की कुंडली
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दिल्ली की उमस भरी दोपहर थी। नेताजी, मतलब श्री सत्यप्रकाश अवस्थी, अपने वातानुकूलित दफ्तर में बैठे, शहर को हरा-भरा बनाने की अपनी नवीनतम योजना पर विचार कर रहे थे। 'ग्रीन दिल्ली, क्लीन दिल्ली!' उनका नारा था, जो हर चुनावी रैली में गूंजता था। लेकिन सच तो ये था कि नेताजी को पेड़ों से ज़्यादा वोट प्यारे थे।
उनकी योजना थी यमुना किनारे एक 'इको-फ्रेंडली' थीम पार्क बनाना। ज़ाहिर है, इको-फ्रेंडली का मतलब था कंक्रीट, कांच और कुछ नकली पौधे। "ये दिल्ली वाले क्या समझेंगे असली हरियाली?" उन्होंने अपने निजी सहायक, पांडेजी से कहा, जो हमेशा हाँ में हाँ मिलाते थे। "उन्हें चाहिए चमक-दमक, सेल्फी पॉइंट!"
पांडेजी ने सर हिलाया। "आप तो अंतर्यामी हैं, नेताजी।"
लेकिन नेताजी की योजना में एक छोटी सी दिक्कत थी - बंदर। दिल्ली के बंदर, जो ट्रैफिक जाम से लेकर सरकारी दफ्तरों तक, हर जगह कब्ज़ा जमाए बैठे थे। यमुना किनारे तो उनका साम्राज्य था।
अगले दिन, नेताजी और उनकी टीम थीम पार्क के लिए जगह देखने गए। जैसे ही उनकी गाड़ियाँ रुकीं, बंदरों का एक झुंड उन पर टूट पड़ा। नेताजी ने चीखते हुए पांडेजी के पीछे छुपने की कोशिश की।
"अरे बाप रे! ये क्या गुंडागर्दी है?" नेताजी चिल्लाए।
एक बंदर ने उनकी टोपी छीन ली और उसे उछालने लगा। दूसरा पांडेजी का चश्मा लेकर भाग गया।
"मारो इनको! भगाओ!" नेताजी ने आदेश दिया, लेकिन उनकी आवाज़ बंदरों के शोर में दब गई।
सुरक्षा गार्ड लाठियाँ लेकर दौड़े, लेकिन बंदर उनसे भी तेज़ थे। वे गाड़ियों पर चढ़ गए, शीशे तोड़ने लगे और जो मिला, उसे लूटने लगे।
नेताजी ने देखा कि एक बंदर उनकी ब्रीफ़केस लेकर पेड़ पर चढ़ गया है। उस ब्रीफ़केस में थीम पार्क का ब्लूप्रिंट था, जो उन्होंने बड़े जतन से बनवाया था।
"नहीं! वो मेरा ब्लूप्रिंट है!" नेताजी चिल्लाए, लेकिन बंदर ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उसने ब्रीफ़केस खोली और ब्लूप्रिंट को हवा में लहराने लगा।
नेताजी को गुस्सा आ गया। उन्होंने एक पत्थर उठाया और बंदर को मारने की कोशिश की, लेकिन निशाना चूक गया। पत्थर एक पेड़ से टकराया और एक मधुमक्खी का छत्ता गिर गया।
अब तो जैसे प्रलय आ गया। मधुमक्खियों ने नेताजी और उनकी टीम पर हमला कर दिया। सब लोग इधर-उधर भागने लगे, चीखते-चिल्लाते हुए।
नेताजी, मधुमक्खियों से बचते हुए, एक गड्ढे में गिर गए। ऊपर से बंदर ब्लूप्रिंट के टुकड़े-टुकड़े करके उन पर फेंक रहे थे।
उस दिन नेताजी को समझ में आया कि प्रकृति से पंगा लेना कितना महंगा पड़ सकता है। उनकी 'ग्रीन दिल्ली, क्लीन दिल्ली!' की योजना यमुना के बंदरों और मधुमक्खियों ने मिलकर धराशायी कर दी।
बाद में, नेताजी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने घोषणा की कि वे अब 'प्रकृति के साथ सद्भाव' में काम करेंगे। ज़ाहिर है, इसका मतलब था कि वे बंदरों को केले और मधुमक्खियों को शहद खिलाएंगे, ताकि वे अगले चुनाव तक शांत रहें।
लेकिन दिल्ली वाले जानते थे कि नेताजी की हरियाली की असली परिभाषा कंक्रीट ही रहेगी, बस अब उस पर बंदरों के लिए कुछ झूले भी लग जाएंगे।
उनकी योजना थी यमुना किनारे एक 'इको-फ्रेंडली' थीम पार्क बनाना। ज़ाहिर है, इको-फ्रेंडली का मतलब था कंक्रीट, कांच और कुछ नकली पौधे। "ये दिल्ली वाले क्या समझेंगे असली हरियाली?" उन्होंने अपने निजी सहायक, पांडेजी से कहा, जो हमेशा हाँ में हाँ मिलाते थे। "उन्हें चाहिए चमक-दमक, सेल्फी पॉइंट!"
पांडेजी ने सर हिलाया। "आप तो अंतर्यामी हैं, नेताजी।"
लेकिन नेताजी की योजना में एक छोटी सी दिक्कत थी - बंदर। दिल्ली के बंदर, जो ट्रैफिक जाम से लेकर सरकारी दफ्तरों तक, हर जगह कब्ज़ा जमाए बैठे थे। यमुना किनारे तो उनका साम्राज्य था।
अगले दिन, नेताजी और उनकी टीम थीम पार्क के लिए जगह देखने गए। जैसे ही उनकी गाड़ियाँ रुकीं, बंदरों का एक झुंड उन पर टूट पड़ा। नेताजी ने चीखते हुए पांडेजी के पीछे छुपने की कोशिश की।
"अरे बाप रे! ये क्या गुंडागर्दी है?" नेताजी चिल्लाए।
एक बंदर ने उनकी टोपी छीन ली और उसे उछालने लगा। दूसरा पांडेजी का चश्मा लेकर भाग गया।
"मारो इनको! भगाओ!" नेताजी ने आदेश दिया, लेकिन उनकी आवाज़ बंदरों के शोर में दब गई।
सुरक्षा गार्ड लाठियाँ लेकर दौड़े, लेकिन बंदर उनसे भी तेज़ थे। वे गाड़ियों पर चढ़ गए, शीशे तोड़ने लगे और जो मिला, उसे लूटने लगे।
नेताजी ने देखा कि एक बंदर उनकी ब्रीफ़केस लेकर पेड़ पर चढ़ गया है। उस ब्रीफ़केस में थीम पार्क का ब्लूप्रिंट था, जो उन्होंने बड़े जतन से बनवाया था।
"नहीं! वो मेरा ब्लूप्रिंट है!" नेताजी चिल्लाए, लेकिन बंदर ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उसने ब्रीफ़केस खोली और ब्लूप्रिंट को हवा में लहराने लगा।
नेताजी को गुस्सा आ गया। उन्होंने एक पत्थर उठाया और बंदर को मारने की कोशिश की, लेकिन निशाना चूक गया। पत्थर एक पेड़ से टकराया और एक मधुमक्खी का छत्ता गिर गया।
अब तो जैसे प्रलय आ गया। मधुमक्खियों ने नेताजी और उनकी टीम पर हमला कर दिया। सब लोग इधर-उधर भागने लगे, चीखते-चिल्लाते हुए।
नेताजी, मधुमक्खियों से बचते हुए, एक गड्ढे में गिर गए। ऊपर से बंदर ब्लूप्रिंट के टुकड़े-टुकड़े करके उन पर फेंक रहे थे।
उस दिन नेताजी को समझ में आया कि प्रकृति से पंगा लेना कितना महंगा पड़ सकता है। उनकी 'ग्रीन दिल्ली, क्लीन दिल्ली!' की योजना यमुना के बंदरों और मधुमक्खियों ने मिलकर धराशायी कर दी।
बाद में, नेताजी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने घोषणा की कि वे अब 'प्रकृति के साथ सद्भाव' में काम करेंगे। ज़ाहिर है, इसका मतलब था कि वे बंदरों को केले और मधुमक्खियों को शहद खिलाएंगे, ताकि वे अगले चुनाव तक शांत रहें।
लेकिन दिल्ली वाले जानते थे कि नेताजी की हरियाली की असली परिभाषा कंक्रीट ही रहेगी, बस अब उस पर बंदरों के लिए कुछ झूले भी लग जाएंगे।
About This Story
Genres: Drama
Description: एक महत्वाकांक्षी राजनेता शहर को बदलने की कोशिश करता है, लेकिन प्रकृति का एक अप्रत्याशित प्रकोप उसकी योजनाओं को खतरे में डाल देता है, जिससे एक हास्यप्रद और अराजक संघर्ष होता है।