अमरई की छाँव (Amrai Ki Chhaon - The Shade of the Mango Grove)

By Amit Kumar Pawar | 2026-01-24 | 1 min read

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अमरई की छाँव, वो कच्ची पगडंडी,
नंगे पाँव दौड़ना, मिट्टी की गंध।
वो पहला सावन, कागज की नाव,
बारिश में भीगना, बेफिक्र स्वभाव।

माँ की लोरी, दादी की कहानी,
चंदा मामा की झूठी निशानी।
वो गुड्डे-गुड़िया का छोटा सा घर,
खेल-खेल में बीत जाता था पहर।

अमरूद के पेड़ पर चढ़ना, गिरना, संभलना,
कच्चे आमों को चोरी से खाना, छिपना।
वो तितलियों के पीछे भागना, पकड़ना, छोड़ना,
खुली हवा में साँस लेना, दिल खोलकर रोना।

स्कूल की घंटी, दोस्तों का साथ,
किताबों में खो जाना, सपनों की बात।
वो पहला प्यार, चोरी-छुपे देखना,
डरना, शर्माना, दिल ही दिल में कहना।

पिताजी का कंधा, दुनिया की सैर,
उनकी डांट में भी छुपा था प्यार का पहर।
वो त्योहारों की रौनक, मिठाइयों की खुशबू,
पूरे घर में गूंजती थी हंसी और खुसबू।

अब सब कुछ बदल गया है, शहर की भीड़ में,
खो गया है वो बचपन, इस जीवन की दौड़ में।
पर आज भी याद आती है वो अमरई की छाँव,
वो कच्ची पगडंडी, वो मिट्टी की गंध, मेरा गाँव।

वो नदी का किनारा, जहाँ बैठ कर सपने बुनते थे,
भविष्य की कल्पना करते थे, हँसते थे, गुनगुनाते थे।
वो पतंग उड़ाना, आसमान को छूना,
हार कर भी खुश होना, कभी न रुकना।

वो रात में तारों को गिनना, कहानियाँ गढ़ना,
डर के मारे दादी से लिपट जाना, फिर सो जाना।
वो दीवाली के दीये, होली के रंग,
हर त्योहार में अपनों का संग।

वो राखी का बंधन, भाई-बहन का प्यार,
कभी लड़ना, कभी मानना, यही था संसार।
वो रक्षाबंधन की थाली, आरती की थाली,
माँ के हाथों का खाना, वो थाली निराली।

अब सब कुछ धुंधला सा लगता है,
जैसे कोई सपना टूट गया है।
पर दिल में बसी है वो बचपन की यादें,
जो कभी नहीं मिट पाएंगी, बन कर फरयादें।

अमरई की छाँव, अब भी बुलाती है,
वो कच्ची पगडंडी, अब भी याद आती है।
काश, मैं फिर से लौट पाता उस बचपन में,
जी पाता वो जिंदगी, फिर से एक बार इस जीवन में।

वो सादगी, वो मासूमियत, वो बेफिक्री,
अब कहाँ मिलती है, इस शहर की नगरी।
ढूंढता हूँ मैं उस बचपन को हर गली में,
पर वो तो खो गया है, इस जीवन की पहेली में।

शायद, वो बचपन अब भी कहीं है,
मेरे दिल में, मेरी यादों में, मेरी साँसों में कहीं है।
बस, उसे महसूस करने की ज़रूरत है,
उस पल को जीने की ज़रूरत है, उस अमरई की छाँव में।

About This Story

Genres: Poetry

Description: A nostalgic poem reflecting on the simple joys and bittersweet memories of childhood spent in the shade of a mango grove, evoking a sense of longing and reminiscence.