पहाड़ों की गूँज में खोया मन (Pahaadon ki Goonj Mein Khoya Mann - A Mind Lost in the Echoes of the Mountains)
Story Content
ये शहर, ये भीड़, ये शोर,
सब कुछ धुंधला सा लगने लगा था।
जैसे किसी ने रंग छीन लिए हों,
मेरी ज़िन्दगी की किताब से।
मन उदास, आत्मा बोझिल,
एक अनजानी थकान हर पल।
फिर एक दिन, सब छोड़कर,
पहाड़ों की ओर चल दिया।
वो रास्ता, घुमावदार,
जैसे ज़िन्दगी की उलझनें।
पर हर मोड़ पर एक नया नज़ारा,
एक नई उम्मीद की किरण।
ऊँचे-ऊँचे पहाड़,
जैसे आसमान को छूने की ज़िद।
शांत, गंभीर, अडिग,
मानो सदियों से खड़े हों,
ज़िन्दगी के सारे रंग देखते हुए।
नीचे गहरी खाई,
डर और रोमांच का मिश्रण।
लेकिन उस गहराई में भी,
एक सुकून, एक शांति।
हवा में ठंडक,
एक अलग सी ताजगी।
जैसे प्रकृति ने खुद,
अपने हाथों से छुआ हो।
पेड़, हरे-भरे,
मानो जीवन का उत्सव मना रहे हों।
उनकी पत्तियाँ,
हवा में सरसराहट करती,
जैसे कोई रहस्यमयी कहानी सुना रही हों।
चिड़ियों की चहचहाहट,
एक मधुर संगीत।
जैसे पहाड़ों ने,
अपनी आवाज़ दी हो।
सूरज की किरणें,
पहाड़ों पर पड़ती,
तो एक सुनहरा नज़ारा बनता।
जैसे किसी ने,
सोने की परत चढ़ा दी हो।
रात में तारे,
आसमान में टिमटिमाते,
जैसे अनगिनत दीपक जल रहे हों।
उनकी रोशनी में,
पहाड़ और भी रहस्यमय लगते।
मैं घंटों बैठा रहता,
पहाड़ों को देखता रहता।
उनकी शांति,
मेरे मन में उतर जाती।
वो अकेलापन,
जो शहर में खलता था,
यहाँ सुकून बन गया।
मुझे लगा,
जैसे मैं पहाड़ों का ही हिस्सा हूँ।
जैसे मेरा भी,
इन पत्थरों, पेड़ों,
और हवाओं से कोई रिश्ता है।
यहाँ, ज़िन्दगी,
अपनी असली रूप में दिखती है।
सरल, सहज, सुंदर।
कोई दिखावा नहीं,
कोई बनावट नहीं।
बस प्रकृति,
और उसकी अनमोल देन।
मैं वापस शहर तो आ गया,
लेकिन मेरा मन,
अब भी पहाड़ों में ही है।
उन ऊँचाइयों में,
उस शांति में,
उस सुकून में।
जब भी मन उदास होता है,
मैं आँखें बंद कर लेता हूँ,
और पहाड़ों की गूँज सुनता हूँ।
वो गूँज,
मुझे याद दिलाती है,
कि ज़िन्दगी में,
कितनी खूबसूरती है।
और मैं,
उस खूबसूरती का,
एक छोटा सा हिस्सा हूँ।
सब कुछ धुंधला सा लगने लगा था।
जैसे किसी ने रंग छीन लिए हों,
मेरी ज़िन्दगी की किताब से।
मन उदास, आत्मा बोझिल,
एक अनजानी थकान हर पल।
फिर एक दिन, सब छोड़कर,
पहाड़ों की ओर चल दिया।
वो रास्ता, घुमावदार,
जैसे ज़िन्दगी की उलझनें।
पर हर मोड़ पर एक नया नज़ारा,
एक नई उम्मीद की किरण।
ऊँचे-ऊँचे पहाड़,
जैसे आसमान को छूने की ज़िद।
शांत, गंभीर, अडिग,
मानो सदियों से खड़े हों,
ज़िन्दगी के सारे रंग देखते हुए।
नीचे गहरी खाई,
डर और रोमांच का मिश्रण।
लेकिन उस गहराई में भी,
एक सुकून, एक शांति।
हवा में ठंडक,
एक अलग सी ताजगी।
जैसे प्रकृति ने खुद,
अपने हाथों से छुआ हो।
पेड़, हरे-भरे,
मानो जीवन का उत्सव मना रहे हों।
उनकी पत्तियाँ,
हवा में सरसराहट करती,
जैसे कोई रहस्यमयी कहानी सुना रही हों।
चिड़ियों की चहचहाहट,
एक मधुर संगीत।
जैसे पहाड़ों ने,
अपनी आवाज़ दी हो।
सूरज की किरणें,
पहाड़ों पर पड़ती,
तो एक सुनहरा नज़ारा बनता।
जैसे किसी ने,
सोने की परत चढ़ा दी हो।
रात में तारे,
आसमान में टिमटिमाते,
जैसे अनगिनत दीपक जल रहे हों।
उनकी रोशनी में,
पहाड़ और भी रहस्यमय लगते।
मैं घंटों बैठा रहता,
पहाड़ों को देखता रहता।
उनकी शांति,
मेरे मन में उतर जाती।
वो अकेलापन,
जो शहर में खलता था,
यहाँ सुकून बन गया।
मुझे लगा,
जैसे मैं पहाड़ों का ही हिस्सा हूँ।
जैसे मेरा भी,
इन पत्थरों, पेड़ों,
और हवाओं से कोई रिश्ता है।
यहाँ, ज़िन्दगी,
अपनी असली रूप में दिखती है।
सरल, सहज, सुंदर।
कोई दिखावा नहीं,
कोई बनावट नहीं।
बस प्रकृति,
और उसकी अनमोल देन।
मैं वापस शहर तो आ गया,
लेकिन मेरा मन,
अब भी पहाड़ों में ही है।
उन ऊँचाइयों में,
उस शांति में,
उस सुकून में।
जब भी मन उदास होता है,
मैं आँखें बंद कर लेता हूँ,
और पहाड़ों की गूँज सुनता हूँ।
वो गूँज,
मुझे याद दिलाती है,
कि ज़िन्दगी में,
कितनी खूबसूरती है।
और मैं,
उस खूबसूरती का,
एक छोटा सा हिस्सा हूँ।
About This Story
Genres: Poetry
Description: A free verse poem about finding solace and a sense of belonging in the majestic beauty of the mountains, reflecting on the peace and clarity they bring to a troubled mind.