अभिशापित वन का उत्तराधिकारी

By Amit Kumar Pawar | 2026-01-31 | 3 min read

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धुंधली सुबह थी। जंगल हमेशा धुंधला ही रहता था, पर आज कुछ और ही बात थी। ये धुंध नहीं, निराशा थी, जो मेरे दिल से उठकर पेड़ों में फैल गयी थी। मैं, वीर, इस अभिशापित वन का उत्तराधिकारी। अभिशाप ये था कि हमारी हर पत्ती, हर बूंद, हर जादू, परिषद की लालची नज़रों में थी।

कल रात परिषद का दूत आया था। उसका प्रस्ताव, धमकी ज़्यादा थी। वे वन को 'सुरक्षित' करना चाहते थे, यानी उस पर कब्ज़ा। उन्होंने कहा, “वीर, तुम जानते हो, ये वन कितना शक्तिशाली है। इसे यूं ही जंगली नहीं छोड़ा जा सकता। हम इसे बेहतर इस्तेमाल करेंगे, तुम्हारे लोगों के लिए।”

'तुम्हारे लोगों के लिए!' मेरे अंदर का गुस्सा लावा की तरह उबलने लगा। 'मेरे लोगों के लिए?' वे तो बस हमारी जादुई लकड़ियों और जड़ी-बूटियों को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे।

मैं उस दूत से बहस कर सकता था, पर जानता था, वो बेकार था। परिषद पत्थर दिल थी। उसे वन की सुंदरता, इसकी शांति, इसकी आत्मा से कोई मतलब नहीं था।

आज मैं वन के सबसे पुराने वृक्ष, 'महावृक्ष' के पास आया था। इसकी जड़ें धरती में इतनी गहरी थीं, कि मानो पूरे वन का भार इसने उठा रखा हो। मैंने महावृक्ष को स्पर्श किया। उसकी खुरदरी छाल मेरे हाथों को सहला रही थी।

“महावृक्ष,” मैंने फुसफुसाया, “मैं क्या करूँ? परिषद वन को छीनना चाहती है। मैं उन्हें कैसे रोकूँ?”

महावृक्ष ने कोई जवाब नहीं दिया, पर मुझे लगा, उसकी पत्तियों की सरसराहट में कोई उत्तर छिपा है। शायद वो कह रहा था, “वीर, वन की रक्षा करो, चाहे जो भी हो।”

पर कैसे? परिषद की सेना बहुत बड़ी थी। हमारे लोग संख्या में बहुत कम थे, और हमारी जादू परिषद की शक्ति के सामने कुछ भी नहीं थी।

फिर मुझे याद आया, वन खुद एक हथियार था। ये वन जादुई शक्तियों से भरा था, जिसका उपयोग हमने कभी युद्ध के लिए नहीं किया था। पर अब, शायद यही एकमात्र रास्ता था।

मैंने अपने लोगों को इकट्ठा किया। उन्हें परिषद के प्रस्ताव के बारे में बताया, और अपने इरादे के बारे में। कुछ डर गए, कुछ नाराज़ हुए, पर अंत में, सबने मेरा साथ देने का फैसला किया।

“हम वन की रक्षा करेंगे,” मैंने कहा, “और हम परिषद को दिखा देंगे कि अभिशापित वन को हल्के में लेना कितना महंगा पड़ सकता है।”

हमने वन की जादू का उपयोग करके जाल बिछाए, भ्रम उत्पन्न किए, और पेड़ों को जीवित योद्धाओं में बदल दिया। जब परिषद की सेना वन में घुसी, तो उन्हें नरक का अनुभव हुआ।

लेकिन परिषद भी तैयार थी। उन्होंने जादूगरों को भेजा, जिन्होंने हमारे जालों को नष्ट कर दिया और भ्रम को तोड़ दिया। लड़ाई भयंकर थी। खून और जादू हर जगह फैल गया।

एक पल ऐसा भी आया, जब मुझे लगा, हम हार रहे हैं। परिषद की सेना आगे बढ़ रही थी, और हमारे लोग पीछे हट रहे थे। तभी मैंने देखा, महावृक्ष हिल रहा है। उसकी जड़ें ज़मीन से उखड़ रही थीं, और वो एक विशालकाय योद्धा में बदल रहा था।

महावृक्ष ने परिषद के जादूगरों को कुचल दिया, और सेना को तितर-बितर कर दिया। उसकी शक्ति इतनी प्रचंड थी, कि परिषद के लोग डरकर भाग गए।

हमने लड़ाई जीत ली थी, पर नुकसान बहुत हुआ था। कई लोग मारे गए थे, और वन को भी बहुत क्षति पहुँची थी। महावृक्ष फिर से एक वृक्ष बन गया था, पर उसकी छाल पर अब घाव थे।

मैंने महावृक्ष के पास जाकर उसे धन्यवाद दिया। उसने मुझे जवाब नहीं दिया, पर मुझे पता था, वो सुन रहा है।

परिषद फिर कभी नहीं आई। उन्होंने वन को अकेला छोड़ दिया। शायद उन्हें एहसास हो गया था कि कुछ चीजें हैं, जिन्हें पैसों से नहीं खरीदा जा सकता, और ताकत से नहीं छीना जा सकता।

मैं आज भी वन का उत्तराधिकारी हूँ। मैं जानता हूँ, मेरी ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है। मुझे वन की रक्षा करनी है, और अपने लोगों को सुरक्षित रखना है। और मुझे ये भी याद रखना है, कि वन सिर्फ एक जगह नहीं है, ये एक आत्मा है, जिसे हमें हमेशा जीवित रखना है। यह एक लड़ाई थी जो कभी ख़त्म नहीं होगी, एक ऐसा युद्ध जो प्रकृति और मानव महत्वाकांक्षा के बीच हमेशा चलता रहेगा। मेरा कर्तव्य है कि मैं इस संघर्ष में अपने लोगों और अपने वन का नेतृत्व करूँ।

About This Story

Genres: Drama

Description: A young man, heir to a magical forest coveted by a power-hungry council, must choose between his heritage and the safety of his people. His fight against nature and the council intertwines, blurring the lines between protector and destroyer.