साँझ का रंग, बदलता मन

By Amit Kumar Pawar | 2026-02-04 | 1 min read

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साँझ का रंग, बदलता मन,
आसमान में फैली लालिमा,
जैसे किसी पुराने घाव पर,
धीरे-धीरे जमती हुई परत।

गर्मी की तपिश, अब धुंधली याद,
पसीने की चिपचिपाहट,
और दोपहर की सुस्ती,
सब जैसे किसी दूर देश की कहानी।

बारिश की बूंदों ने,
मिट्टी की सौंधी खुशबू से,
जो रिश्ता बनाया था,
वो भी अब फीका पड़ने लगा है।

हवा में एक अजीब सी खामोशी है,
पेड़ों के पत्ते,
अपनी हरी भरी जवानी खोकर,
पीले और भूरे होने लगे हैं।

जैसे उन्हें भी पता चल गया है,
कि अब बिछड़ने का वक्त आ गया है।

और मैं,
मैं भी तो बदल रही हूँ,
धीरे-धीरे, चुपचाप।

जैसे नदी का पानी,
अपना रास्ता बदल लेता है,
वैसे ही मेरे सपने,
मेरी उम्मीदें,
सब कुछ बदल रहा है।

वो हंसी जो कभी बेफिक्री से गूंजती थी,
अब उसमें एक हल्की सी उदासी है।
वो आंखें जो कभी चमकती थीं,
अब उनमें एक गहरा सवाल है।

शरद ऋतु का यह मौसम,
मुझे हर साल कुछ सिखाता है।
कि परिवर्तन ही जीवन है,
और हर अंत,
एक नई शुरुआत का संकेत है।

पर सच कहूं तो,
यह बदलाव थोड़ा डरावना भी लगता है।
जैसे किसी अनजान रास्ते पर,
अकेले चलने का डर।

वो पुराने दिन,
वो पुरानी बातें,
वो पुराने लोग,
सब छूटते जा रहे हैं।

और मैं,
मैं बस देखती रहती हूँ,
सब कुछ बदलते हुए।

पर शायद यही जीवन है।
बदलाव को स्वीकार करना,
और आगे बढ़ते रहना।

जैसे पतझड़ के बाद,
फिर से वसंत आता है,
वैसे ही शायद,
मेरी जिंदगी में भी,
एक नया सवेरा आएगा।

लेकिन फिलहाल,
मैं इस साँझ के रंग को जी लेती हूँ,
इस बदलते मन को समझ लेती हूँ,
और इस खामोशी में,
अपने आप को ढूंढ लेती हूँ।

क्योंकि शायद,
यही मेरे जीवन का,
सबसे खूबसूरत पल है।

यह जानना,
कि मैं बदल रही हूँ,
और यह मानना,
कि यह बदलाव,
मुझे और भी मजबूत बनाएगा।

कल की धूप,
आज से अलग होगी,
मेरा मन,
कल और भी शांत होगा।
और शायद,
मैं भी,
थोड़ी और समझदार हो जाऊँगी।
साँझ का रंग, बदलता मन,
एक अनकही कहानी।

About This Story

Genres: Poetry

Description: A poem about the changing seasons mirroring the internal shifts in one's mind and heart, acknowledging both the beauty and melancholic acceptance of time's passage.