पीपल की छाँव
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पीपल की छाँव,
आज भी वैसी ही,
शांत,
स्थिर,
जैसे कल थी।
मगर,
मैं?
मैं कहाँ हूँ,
उस लड़के से,
जो इसकी जड़ों में,
कहानियाँ बुनता था?
वो दोपहरें,
माँ की गोद,
और पीपल के पत्तों की,
सरसराहट,
सब धुंधला गया है।
वो सड़क,
जो गाँव तक जाती थी,
अब शहर में खो गई है,
जैसे मेरा बचपन,
किसी भीड़ में,
गुम हो गया हो।
साइकिल की घंटी,
जो कभी गूंजती थी,
हवा में,
अब ट्रैफिक के शोर में,
दब गई है।
वो नीम का पेड़,
जिस पर हम झूला झूलते थे,
अब कहाँ है?
शायद,
किसी इमारत के नीचे,
दफन हो गया होगा।
वक़्त,
कैसे बहता है,
नदी की तरह,
अपने साथ सब कुछ,
ले जाता है।
यादें,
सिर्फ यादें,
बच जाती हैं,
सूखे पत्तों की तरह,
डायरी के पन्नों में।
और मैं,
उन्हें समेटने की,
कोशिश करता हूँ,
हर बार,
नाकाम होता हूँ।
पीपल की छाँव,
आज भी देखती है,
मेरी बेबसी,
मेरी थकान,
और कहती है,
"रूको,
थोड़ा दम लो।"
लेकिन,
वक़्त कहाँ रुकता है?
वो तो चलता ही रहता है,
बिना थके,
बिना मुड़े।
एक और सूरज डूबा,
एक और दिन बीता,
और मैं,
पीपल की छाँव में,
बैठा,
सोचता हूँ,
क्या खोया,
क्या पाया।
शायद,
कुछ नहीं,
शायद,
सब कुछ।
बस,
वक़्त,
वक़्त ही है,
जो बदल गया।
और मैं,
उस बदलाव का,
एक हिस्सा बन गया।
अब,
पीपल की छाँव में,
बैठकर,
मैं देखता हूँ,
नए बच्चों को,
खेलते हुए,
हँसते हुए,
और सोचता हूँ,
शायद,
यही वक़्त है,
जो अपनी कहानी,
फिर से दोहरा रहा है।
और मैं,
उस कहानी का,
एक दर्शक बन गया हूँ।
एक बूढ़ा दर्शक।
पीपल की छाँव,
हमेशा की तरह,
शांत,
स्थिर,
देखती रहती है।
आज भी वैसी ही,
शांत,
स्थिर,
जैसे कल थी।
मगर,
मैं?
मैं कहाँ हूँ,
उस लड़के से,
जो इसकी जड़ों में,
कहानियाँ बुनता था?
वो दोपहरें,
माँ की गोद,
और पीपल के पत्तों की,
सरसराहट,
सब धुंधला गया है।
वो सड़क,
जो गाँव तक जाती थी,
अब शहर में खो गई है,
जैसे मेरा बचपन,
किसी भीड़ में,
गुम हो गया हो।
साइकिल की घंटी,
जो कभी गूंजती थी,
हवा में,
अब ट्रैफिक के शोर में,
दब गई है।
वो नीम का पेड़,
जिस पर हम झूला झूलते थे,
अब कहाँ है?
शायद,
किसी इमारत के नीचे,
दफन हो गया होगा।
वक़्त,
कैसे बहता है,
नदी की तरह,
अपने साथ सब कुछ,
ले जाता है।
यादें,
सिर्फ यादें,
बच जाती हैं,
सूखे पत्तों की तरह,
डायरी के पन्नों में।
और मैं,
उन्हें समेटने की,
कोशिश करता हूँ,
हर बार,
नाकाम होता हूँ।
पीपल की छाँव,
आज भी देखती है,
मेरी बेबसी,
मेरी थकान,
और कहती है,
"रूको,
थोड़ा दम लो।"
लेकिन,
वक़्त कहाँ रुकता है?
वो तो चलता ही रहता है,
बिना थके,
बिना मुड़े।
एक और सूरज डूबा,
एक और दिन बीता,
और मैं,
पीपल की छाँव में,
बैठा,
सोचता हूँ,
क्या खोया,
क्या पाया।
शायद,
कुछ नहीं,
शायद,
सब कुछ।
बस,
वक़्त,
वक़्त ही है,
जो बदल गया।
और मैं,
उस बदलाव का,
एक हिस्सा बन गया।
अब,
पीपल की छाँव में,
बैठकर,
मैं देखता हूँ,
नए बच्चों को,
खेलते हुए,
हँसते हुए,
और सोचता हूँ,
शायद,
यही वक़्त है,
जो अपनी कहानी,
फिर से दोहरा रहा है।
और मैं,
उस कहानी का,
एक दर्शक बन गया हूँ।
एक बूढ़ा दर्शक।
पीपल की छाँव,
हमेशा की तरह,
शांत,
स्थिर,
देखती रहती है।
About This Story
Genres: Poetry
Description: A poem reflecting on the relentless march of time, observed through the enduring presence of a familiar banyan tree and the changing landscapes of life.