अमावस की जुगनू (Amaavas ki Jugnu - Firefly of the New Moon)
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अंधेरी रात थी, अमावस का पहर,
जैसे दिल में उतरा हो, एक गहरा कहर।
चारों ओर सन्नाटा, सांस भी थम सी गई,
जिंदगी की राह, कहीं गुम सी गई।
हर उम्मीद का दिया, बुझ सा गया था,
हर सपना, रेत में दफन हो गया था।
आँखों में नमी थी, मन में था खालीपन,
जैसे खो गया हो, मेरा अपना वतन।
ये कैसी रात है, जो कटती नहीं,
ये कैसा दर्द है, जो मिटता नहीं।
क्या कभी सुबह होगी, क्या कभी धूप खिलेगी,
या बस अंधेरों में ही, जिंदगी ढलेगी?
फिर अचानक, एक टिमटिमाती लौ दिखी,
अंधेरे में उम्मीद की, एक किरण दिखी।
एक जुगनू था वो, छोटा सा, अकेला,
अमावस की रात में, जैसे उम्मीद का मेला।
उसकी रोशनी, धीमी थी, मगर थी तो सही,
अंधेरे से लड़ने की, एक कोशिश तो सही।
जैसे कह रहा हो, "मैं हूँ न, डर मत तू,
अंधेरा कितना भी गहरा हो, हार मत तू।"
उस छोटे से जुगनू ने, हौसला जगाया,
धड़कनों को फिर से, जीना सिखाया।
याद आया, कि मैं भी तो, एक लौ हूँ,
अपने अंदर की रोशनी से, कभी न गुम हूँ।
माना कि रास्ता मुश्किल है, माना कि दर्द गहरा है,
मगर हर रात के बाद, एक सुनहरा सवेरा है।
जुगनू की तरह, मैं भी चमकूंगा,
अपने सपनों को फिर से, सच करूँगा।
ये जिंदगी है, इम्तिहान तो लेगी,
मगर हर इम्तिहान में, कुछ तो देगी।
अमावस की रात में, जुगनू का मिलना,
जैसे ईश्वर का था, एक इशारा, एक दिलासा।
अब डर नहीं लगता, अब गम नहीं होता,
क्योंकि दिल में है, उस जुगनू का सहारा।
अंधेरा कितना भी गहरा हो, मैं चलूंगा,
अपने सपनों की राह पर, मैं मिलूंगा।
वो छोटा सा जुगनू, मेरी प्रेरणा बन गया,
अमावस की रात में, उम्मीद का नशा बन गया।
हर मुश्किल में, याद रखूँगा उसे,
और कभी न छोडूंगा, उम्मीद का दामन ऐसे।
अब हर रात, जुगनू को ढूंढता हूँ,
उसी से, अपनी राह रोशन करता हूँ।
क्योंकि जानता हूँ, अंधेरे में भी,
कहीं न कहीं, उम्मीद का जुगनू है सही।
जैसे दिल में उतरा हो, एक गहरा कहर।
चारों ओर सन्नाटा, सांस भी थम सी गई,
जिंदगी की राह, कहीं गुम सी गई।
हर उम्मीद का दिया, बुझ सा गया था,
हर सपना, रेत में दफन हो गया था।
आँखों में नमी थी, मन में था खालीपन,
जैसे खो गया हो, मेरा अपना वतन।
ये कैसी रात है, जो कटती नहीं,
ये कैसा दर्द है, जो मिटता नहीं।
क्या कभी सुबह होगी, क्या कभी धूप खिलेगी,
या बस अंधेरों में ही, जिंदगी ढलेगी?
फिर अचानक, एक टिमटिमाती लौ दिखी,
अंधेरे में उम्मीद की, एक किरण दिखी।
एक जुगनू था वो, छोटा सा, अकेला,
अमावस की रात में, जैसे उम्मीद का मेला।
उसकी रोशनी, धीमी थी, मगर थी तो सही,
अंधेरे से लड़ने की, एक कोशिश तो सही।
जैसे कह रहा हो, "मैं हूँ न, डर मत तू,
अंधेरा कितना भी गहरा हो, हार मत तू।"
उस छोटे से जुगनू ने, हौसला जगाया,
धड़कनों को फिर से, जीना सिखाया।
याद आया, कि मैं भी तो, एक लौ हूँ,
अपने अंदर की रोशनी से, कभी न गुम हूँ।
माना कि रास्ता मुश्किल है, माना कि दर्द गहरा है,
मगर हर रात के बाद, एक सुनहरा सवेरा है।
जुगनू की तरह, मैं भी चमकूंगा,
अपने सपनों को फिर से, सच करूँगा।
ये जिंदगी है, इम्तिहान तो लेगी,
मगर हर इम्तिहान में, कुछ तो देगी।
अमावस की रात में, जुगनू का मिलना,
जैसे ईश्वर का था, एक इशारा, एक दिलासा।
अब डर नहीं लगता, अब गम नहीं होता,
क्योंकि दिल में है, उस जुगनू का सहारा।
अंधेरा कितना भी गहरा हो, मैं चलूंगा,
अपने सपनों की राह पर, मैं मिलूंगा।
वो छोटा सा जुगनू, मेरी प्रेरणा बन गया,
अमावस की रात में, उम्मीद का नशा बन गया।
हर मुश्किल में, याद रखूँगा उसे,
और कभी न छोडूंगा, उम्मीद का दामन ऐसे।
अब हर रात, जुगनू को ढूंढता हूँ,
उसी से, अपनी राह रोशन करता हूँ।
क्योंकि जानता हूँ, अंधेरे में भी,
कहीं न कहीं, उम्मीद का जुगनू है सही।
About This Story
Genres: Poetry
Description: A poem about finding a sliver of hope and resilience during the darkest and most despairing times, personified by a single firefly on a new moon night.