वनगंधा का शाप

By Amit Kumar Pawar | 2026-01-27 | 3 min read

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ये वनगंधा का शाप था, और मैं, वैदेही, उसकी उत्तराधिकारी थी। मेरा जीवन इसी वन में सीमित था, इसकी रक्षा करना, इसकी आत्मा से जुड़ना, यही मेरा धर्म था। पर मेरा मन? वो तो अक्सर इस वन की सीमाएं लांघकर, उस दुनिया में भटकता था जिसकी मुझे झलकियाँ ही नसीब थीं।

फिर एक दिन, वो आया। अर्जुन। वो वन में खो गया था, पर उसकी आँखें जैसे मेरा रास्ता ढूंढ रही थीं। "मैं...मैं रास्ता भटक गया हूँ," उसने कहा था, उसकी आवाज़ में डर और हैरानी थी। मैंने उसे देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी मासूमियत थी, जो मेरे दिल को छू गई। मैंने उसे रास्ता दिखाया, वन के किनारे तक।

उसके बाद वो अक्सर आने लगा। बहाने ढूंढता, कभी फूल देखने, कभी पक्षियों की चहचहाहट सुनने। और मैं, हर बार उसे देखकर मुस्कुराती। हमारी बातें होतीं, घंटों तक। वो मुझे शहर की कहानियाँ सुनाता, अपनी पढ़ाई के बारे में बताता, अपने सपनों के बारे में बताता। और मैं, उसे वन के रहस्य बताती, यहाँ के पेड़ों की भाषा, यहाँ के जानवरों की बातें। धीरे-धीरे, हम एक-दूसरे को चाहने लगे।

"वैदेही, तुम यहाँ से बाहर क्यों नहीं आती?" एक दिन उसने मुझसे पूछा। "ये वन बहुत सुन्दर है, पर तुम इससे भी ज़्यादा सुन्दर हो। तुम्हें दुनिया देखनी चाहिए।"

मैंने उसे शाप के बारे में बताया, उस वचन के बारे में जो मेरी पूर्वजों ने वन से लिया था। कि वनगंधा की रक्षा करने के लिए, हमें यहीं रहना होगा, यहीं मरना होगा।

अर्जुन चुप हो गया। उसकी आँखों में दर्द था। "तो क्या हमारा...हमारा कोई भविष्य नहीं है?" उसने धीमी आवाज़ में पूछा।

मुझे नहीं पता था। मैं अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं सकती थी, पर उसके बिना जी भी नहीं सकती थी। मैंने अपने मन की बात कही। "अर्जुन, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ। पर मैं वन को भी नहीं छोड़ सकती।"

हमारे रिश्ते के बारे में वनवासियों को पता चल गया। उनका क्रोध आसमान छू रहा था। "ये अधर्म है!" मुखिया ने चिल्लाकर कहा। "तुमने वनगंधा के वचन को तोड़ा है। तुम्हें दंड मिलेगा।" उन्होंने अर्जुन को वन में आने से मना कर दिया। मुझे भी उससे मिलने की इजाज़त नहीं थी।

पर प्यार कहाँ रुकता है? हम छुप-छुपकर मिलते रहे। वन की गहराई में, जहाँ कोई हमें देख नहीं सकता था। पर डर हमेशा बना रहता था। डर कि कोई हमें पकड़ लेगा, डर कि वन हमसे नाराज़ हो जाएगा, डर कि हम हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे।

एक दिन, अर्जुन ने कहा, "वैदेही, ये ठीक नहीं है। हम ऐसे कब तक छुपते रहेंगे? हमें कोई रास्ता निकालना होगा।" उसने मुझे अपने साथ शहर चलने को कहा। वहाँ, उसने कहा, हम नई शुरुआत कर सकते हैं, जहाँ किसी को हमारे प्यार से कोई परेशानी नहीं होगी।

मैंने इनकार कर दिया। मैं वन को नहीं छोड़ सकती थी। पर मैं उसे भी नहीं खोना चाहती थी। मेरा दिल दो हिस्सों में बंट गया था।

आखिरकार, मैंने एक फैसला किया। मैंने मुखिया से बात की। मैंने उनसे विनती की, कि मुझे वन से मुक्त कर दें। मैंने कहा कि मैं किसी और को वनगंधा की रक्षा करने के लिए तैयार कर दूंगी, पर मुझे अर्जुन के साथ जाने दें।

मुखिया ने मेरी बात सुनी, पर उनका फैसला नहीं बदला। "वनगंधा का शाप अटूट है," उन्होंने कहा। "तुम यहीं रहोगी।"

हारकर, मैंने अर्जुन से कहा कि वो चला जाए। मैंने उससे कहा कि वो मुझे भूल जाए। मैंने उससे कहा कि उसे अपनी ज़िंदगी जीनी चाहिए, मेरे बिना। उसने मेरी आँखों में देखा, और उसमें आँसू थे। "मैं तुम्हें कभी नहीं भूल पाऊंगा, वैदेही," उसने कहा। "कभी नहीं।"

वो चला गया। और मैं, वन में अकेली रह गई। शाप के साथ, और टूटे हुए दिल के साथ। वनगंधा का शाप शायद हमेशा मेरा पीछा करता रहेगा, पर मैं जानती हूँ, कहीं दूर, अर्जुन भी मुझे याद कर रहा होगा। और यही, मेरे जीने की वजह है।

About This Story

Genres: Romance

Description: A young woman, bound by an ancient curse to the magical forest, finds love with a man from the outside world, a connection forbidden by both society and the forest's magic itself. Their love blossoms amidst danger and prejudice, forcing them to choose between duty and their hearts.