अधूरे सवाल
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ट्रेन की लयबद्ध खड़खड़ाहट मानो मेरे अंदर के बेचैनी को और बढ़ा रही थी। खिड़की से बाहर भागते खेत और गाँव धुंधले से दिख रहे थे, जैसे मेरी अपनी जिंदगी का रास्ता। मैं, रवि, बी.कॉम का फाइनल ईयर का छात्र, एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था जहाँ भविष्य एक डरावने सवाल की तरह सामने था। घरवाले चाहते थे कि मैं सरकारी नौकरी की तैयारी करूँ, एक 'सुरक्षित' भविष्य। पर मेरे अंदर कहीं, एक कलाकार कराह रहा था, रंग और रेखाओं से अपनी दुनिया बनाने के लिए बेताब।
यह लंबा ट्रेन का सफर मुझे दिल्ली से मेरे गाँव, राजस्थान ले जा रहा था। पिताजी ने बुलावा भेजा था – 'जरूरी बात करनी है'। मुझे पता था, वो 'जरूरी बात' मेरी नौकरी की संभावनाओं और मेरी 'गैर-जिम्मेदाराना' कला के बारे में होगी।
सामने वाली सीट पर बैठी एक बूढ़ी अम्मा अपनी माला जप रही थीं। उनकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी, जो मुझे बहुत लुभा रही थी। मैंने हिम्मत करके उनसे बात करने का फैसला किया।
"नमस्ते अम्मा जी," मैंने कहा।
उन्होंने माला रोककर मेरी तरफ देखा। "नमस्ते बेटा। कहाँ जा रहे हो?"
"गाँव जा रहा हूँ, अम्मा जी। कुछ... पारिवारिक मामला है।" मैंने कहा, सच्चाई को थोड़ा छुपाते हुए।
"परिवार... परिवार ही तो सब कुछ होता है," उन्होंने धीरे से कहा। "कभी-कभी थोड़ा मुश्किल जरूर होता है, पर आखिर में, प्यार ही जीतता है।"
उनकी बातों ने मुझे थोड़ा सा सुकून दिया। शायद वो सही कह रही थीं। शायद मेरे परिवार को मेरी कला के बारे में समझने में समय लगेगा।
अगले कुछ घंटे हमने बातें कीं। अम्मा जी ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया – गरीबी, संघर्ष, और फिर भी, हमेशा उम्मीद। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया, उन्हें काबिल बनाया, और अब वो अपने पोते-पोतियों के साथ खुश हैं।
"बेटा, जिंदगी में डरना नहीं चाहिए," उन्होंने कहा। "जो तुम्हारा दिल कहता है, वही करना चाहिए। दुनिया तो हमेशा कुछ न कुछ कहेगी।" उनकी बातें मेरे दिल में घर कर गईं।
शाम होने लगी थी। ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर रुकी। एक लड़का, लगभग मेरी ही उम्र का, डिब्बे में चढ़ा। उसके हाथ में एक गिटार था। उसने एक कोने में बैठकर बजाना शुरू कर दिया। उसकी उंगलियाँ गिटार के तारों पर जादू चला रही थीं। वो एक लोक गीत गा रहा था, जिसमें गाँव की मिट्टी की खुशबू थी, और जिंदगी की सादगी का एहसास।
मैं उसकी धुन में खो गया। मुझे लगा, जैसे मेरी आत्मा उस गीत में बह रही है। अम्मा जी ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराईं।
"देखो, बेटा," उन्होंने कहा। "हर किसी का अपना रास्ता होता है। तुम्हें बस उसे पहचानने की जरूरत है।"
मैंने उस लड़के को देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, एक जुनून था। मुझे एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ। ऐसे और भी लोग हैं जो समाज की बनाई हुई लीक से हटकर अपनी राह बनाना चाहते हैं।
जब मेरा स्टेशन आया, तो मैंने अम्मा जी को धन्यवाद कहा और उनसे विदा ली। ट्रेन से उतरते वक्त, मैंने पीछे मुड़कर देखा। अम्मा जी अभी भी मुस्कुरा रही थीं, और वो लड़का अभी भी गा रहा था। उनकी आवाज़ हवा में तैर रही थी, एक वादा बनकर, एक उम्मीद बनकर।
गाँव की ओर चलते हुए, मेरे अंदर का डर थोड़ा कम हो गया था। मुझे अभी भी नहीं पता था कि मेरे परिवार वाले मेरी कला को स्वीकार करेंगे या नहीं। पर मुझे यह जरूर पता था कि मैं हार नहीं मानूँगा। मैं अपनी राह खुद बनाऊँगा, चाहे उसमें कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं। उस ट्रेन की यात्रा ने मुझे अपने अधूरे सवालों के जवाब ढूंढने की हिम्मत दी थी।
यह लंबा ट्रेन का सफर मुझे दिल्ली से मेरे गाँव, राजस्थान ले जा रहा था। पिताजी ने बुलावा भेजा था – 'जरूरी बात करनी है'। मुझे पता था, वो 'जरूरी बात' मेरी नौकरी की संभावनाओं और मेरी 'गैर-जिम्मेदाराना' कला के बारे में होगी।
सामने वाली सीट पर बैठी एक बूढ़ी अम्मा अपनी माला जप रही थीं। उनकी आँखों में एक अजीब सी शांति थी, जो मुझे बहुत लुभा रही थी। मैंने हिम्मत करके उनसे बात करने का फैसला किया।
"नमस्ते अम्मा जी," मैंने कहा।
उन्होंने माला रोककर मेरी तरफ देखा। "नमस्ते बेटा। कहाँ जा रहे हो?"
"गाँव जा रहा हूँ, अम्मा जी। कुछ... पारिवारिक मामला है।" मैंने कहा, सच्चाई को थोड़ा छुपाते हुए।
"परिवार... परिवार ही तो सब कुछ होता है," उन्होंने धीरे से कहा। "कभी-कभी थोड़ा मुश्किल जरूर होता है, पर आखिर में, प्यार ही जीतता है।"
उनकी बातों ने मुझे थोड़ा सा सुकून दिया। शायद वो सही कह रही थीं। शायद मेरे परिवार को मेरी कला के बारे में समझने में समय लगेगा।
अगले कुछ घंटे हमने बातें कीं। अम्मा जी ने अपनी जिंदगी के बारे में बताया – गरीबी, संघर्ष, और फिर भी, हमेशा उम्मीद। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया, उन्हें काबिल बनाया, और अब वो अपने पोते-पोतियों के साथ खुश हैं।
"बेटा, जिंदगी में डरना नहीं चाहिए," उन्होंने कहा। "जो तुम्हारा दिल कहता है, वही करना चाहिए। दुनिया तो हमेशा कुछ न कुछ कहेगी।" उनकी बातें मेरे दिल में घर कर गईं।
शाम होने लगी थी। ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर रुकी। एक लड़का, लगभग मेरी ही उम्र का, डिब्बे में चढ़ा। उसके हाथ में एक गिटार था। उसने एक कोने में बैठकर बजाना शुरू कर दिया। उसकी उंगलियाँ गिटार के तारों पर जादू चला रही थीं। वो एक लोक गीत गा रहा था, जिसमें गाँव की मिट्टी की खुशबू थी, और जिंदगी की सादगी का एहसास।
मैं उसकी धुन में खो गया। मुझे लगा, जैसे मेरी आत्मा उस गीत में बह रही है। अम्मा जी ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराईं।
"देखो, बेटा," उन्होंने कहा। "हर किसी का अपना रास्ता होता है। तुम्हें बस उसे पहचानने की जरूरत है।"
मैंने उस लड़के को देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, एक जुनून था। मुझे एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ। ऐसे और भी लोग हैं जो समाज की बनाई हुई लीक से हटकर अपनी राह बनाना चाहते हैं।
जब मेरा स्टेशन आया, तो मैंने अम्मा जी को धन्यवाद कहा और उनसे विदा ली। ट्रेन से उतरते वक्त, मैंने पीछे मुड़कर देखा। अम्मा जी अभी भी मुस्कुरा रही थीं, और वो लड़का अभी भी गा रहा था। उनकी आवाज़ हवा में तैर रही थी, एक वादा बनकर, एक उम्मीद बनकर।
गाँव की ओर चलते हुए, मेरे अंदर का डर थोड़ा कम हो गया था। मुझे अभी भी नहीं पता था कि मेरे परिवार वाले मेरी कला को स्वीकार करेंगे या नहीं। पर मुझे यह जरूर पता था कि मैं हार नहीं मानूँगा। मैं अपनी राह खुद बनाऊँगा, चाहे उसमें कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं। उस ट्रेन की यात्रा ने मुझे अपने अधूरे सवालों के जवाब ढूंढने की हिम्मत दी थी।
About This Story
Genres: Drama
Description: A young man on a train journey grapples with societal expectations and his own uncertain future, finding solace in an unexpected connection.