अंधेरों में उगी रौशनी (Andheron Mein Ugi Roshni - Light Sprouted in Darkness)
Story Content
वो गलियां, संकरी और बदबूदार,
जहां बचपन मेरा कुचला गया,
हर सुबह एक नई जंग,
हर रात एक अनकहा डर।
पिताजी, रिक्शा खींचते,
धूप में जलते, पसीने में भीगते,
और मां, घरों में बर्तन मांजती,
उम्मीद की एक किरण लिए।
वो स्कूल की इमारत,
दूर से चमकती हुई,
लेकिन मेरे लिए एक सपना,
जो अक्सर टूट जाता था।
किताबें, कॉपीयां, फीस,
ये सब हमारे लिए विलासिता थीं,
जब पेट भरना ही मुश्किल था,
तो शिक्षा कहां से मिलती।
मैंने देखा, वो भेदभाव,
ऊंच-नीच, जात-पात,
इंसान को इंसान न समझना,
ये कैसा समाज है हमारा?
वो नेताजी, भाषण देते,
गरीबी हटाने के वादे करते,
लेकिन चुनाव जीतने के बाद,
वो हमें भूल जाते थे।
और वो बाबूजी, सरकारी दफ्तर में,
रिश्वत के बिना काम नहीं करते,
गरीबों को लूटने में,
उन्हें कोई शर्म नहीं आती थी।
फिर एक दिन, मैंने देखा,
एक छोटी सी लड़की,
हाथ में पेंसिल लिए,
सड़क पर लिख रही थी।
वो पढ़ना चाहती थी,
कुछ बनना चाहती थी,
अपनी गरीबी से लड़ना चाहती थी,
उसकी आंखों में एक आग थी।
उस लड़की ने मुझे जगाया,
मेरे अंदर की उम्मीद को,
फिर से ज़िंदा किया,
मैंने सोचा, अब चुप नहीं रहूंगा।
मैंने भी हाथ में कलम उठाई,
अपनी आवाज बुलंद की,
उन लोगों के लिए,
जो चुप रह गए थे।
हम साथ चले,
एक कारवां बन गया,
अन्याय के खिलाफ,
एक जंग शुरू हो गई।
कुछ लोग डरे हुए थे,
कुछ लोग साथ आए,
लेकिन हम रुकने वाले नहीं थे,
हमें इंसाफ चाहिए था।
वो दिन भी आएगा,
जब हर बच्चा स्कूल जाएगा,
हर गरीब को रोटी मिलेगी,
और हर इंसान बराबर होगा।
वो दिन भी आएगा,
जब अंधेरों में रौशनी उगेगी,
और न्याय की जीत होगी,
ये मेरा विश्वास है, ये मेरा सपना है।
ये राह मुश्किल है,
पर नामुमकिन नहीं,
हर छोटी कोशिश,
एक बड़ा बदलाव लाएगी।
इसलिए, उठो और चलो,
इंसाफ के लिए,
अपने हक के लिए,
एक नया समाज बनाने के लिए।
क्योंकि अंधेरों में ही,
रौशनी उगती है,
और बदलाव की शुरुआत,
हमसे ही होती है।
जहां बचपन मेरा कुचला गया,
हर सुबह एक नई जंग,
हर रात एक अनकहा डर।
पिताजी, रिक्शा खींचते,
धूप में जलते, पसीने में भीगते,
और मां, घरों में बर्तन मांजती,
उम्मीद की एक किरण लिए।
वो स्कूल की इमारत,
दूर से चमकती हुई,
लेकिन मेरे लिए एक सपना,
जो अक्सर टूट जाता था।
किताबें, कॉपीयां, फीस,
ये सब हमारे लिए विलासिता थीं,
जब पेट भरना ही मुश्किल था,
तो शिक्षा कहां से मिलती।
मैंने देखा, वो भेदभाव,
ऊंच-नीच, जात-पात,
इंसान को इंसान न समझना,
ये कैसा समाज है हमारा?
वो नेताजी, भाषण देते,
गरीबी हटाने के वादे करते,
लेकिन चुनाव जीतने के बाद,
वो हमें भूल जाते थे।
और वो बाबूजी, सरकारी दफ्तर में,
रिश्वत के बिना काम नहीं करते,
गरीबों को लूटने में,
उन्हें कोई शर्म नहीं आती थी।
फिर एक दिन, मैंने देखा,
एक छोटी सी लड़की,
हाथ में पेंसिल लिए,
सड़क पर लिख रही थी।
वो पढ़ना चाहती थी,
कुछ बनना चाहती थी,
अपनी गरीबी से लड़ना चाहती थी,
उसकी आंखों में एक आग थी।
उस लड़की ने मुझे जगाया,
मेरे अंदर की उम्मीद को,
फिर से ज़िंदा किया,
मैंने सोचा, अब चुप नहीं रहूंगा।
मैंने भी हाथ में कलम उठाई,
अपनी आवाज बुलंद की,
उन लोगों के लिए,
जो चुप रह गए थे।
हम साथ चले,
एक कारवां बन गया,
अन्याय के खिलाफ,
एक जंग शुरू हो गई।
कुछ लोग डरे हुए थे,
कुछ लोग साथ आए,
लेकिन हम रुकने वाले नहीं थे,
हमें इंसाफ चाहिए था।
वो दिन भी आएगा,
जब हर बच्चा स्कूल जाएगा,
हर गरीब को रोटी मिलेगी,
और हर इंसान बराबर होगा।
वो दिन भी आएगा,
जब अंधेरों में रौशनी उगेगी,
और न्याय की जीत होगी,
ये मेरा विश्वास है, ये मेरा सपना है।
ये राह मुश्किल है,
पर नामुमकिन नहीं,
हर छोटी कोशिश,
एक बड़ा बदलाव लाएगी।
इसलिए, उठो और चलो,
इंसाफ के लिए,
अपने हक के लिए,
एक नया समाज बनाने के लिए।
क्योंकि अंधेरों में ही,
रौशनी उगती है,
और बदलाव की शुरुआत,
हमसे ही होती है।
About This Story
Genres: Poetry
Description: A poem about the struggle for social justice, seen through the eyes of someone who has witnessed inequality firsthand and finds hope in small acts of resistance and resilience.