अंधेरे से उजाले की ओर
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कितना खोया था मैं, खुद से अनजान,
एक अंधेरी गली में भटकता रहा।
मन में सवाल थे, अनगिनत निशान,
हर जवाब से मैं और उलझता रहा।
दुनिया की भागदौड़, झूठी ये शान,
मुझे ले गई थी कितनी दूर कहीं।
हर खुशी में भी एक खालीपन महान,
जैसे कुछ टूटा हो, भीतर कहीं।
फिर एक दिन, अचानक, क्या हुआ मुझको,
एक धीमी सी आवाज़ आई कहीं से।
जैसे कोई पुकारे, धीमे से, चुपको,
'तू है अनमोल,' कहे मुझको, ऐसे।
रोशनी की एक किरण सी जागी,
अंधेरे में भी, एक उम्मीद सी लागी।
धुंधला सा था सब कुछ, जैसे सपना कोई,
पर उस आवाज़ में सच्चाई थी गहरी।
जैसे बरसों से सोया था मैं, खोई,
और अब खुल रही थी आँखें मेरी।
खुद को ढूँढने की प्यास जगी फिर,
हर सांस में एक नई आस जगी फिर।
मंदिरों में ढूँढा, मस्जिदों में भी गया,
पर वो शांति कहीं बाहर ना मिली।
फिर एक दिन, मैं खुद से ही मिला,
अपने भीतर ही वो दुनिया मिली।
बाहर की तलाश थी बस एक धोखा,
सच्चा ठिकाना तो था दिल में ही रोका।
धीरे-धीरे समझ आया, खेल ये सारा,
मैं ही हूँ कर्ता, मैं ही हूँ भोगता।
दुख-सुख का ये चक्र है न्यारा,
इसे समझकर ही जीवन संवरता।
डर, चिंता, सब दूर हुए ऐसे,
जैसे पतझड़ में पत्ते झड़ते हैं जैसे।
अब डर नहीं लगता, अकेलेपन से भी,
क्योंकि जानता हूँ, मैं अकेला नहीं हूँ।
एक शक्ति है, जो जुड़ी है मुझसे सभी,
हर पल साथ है, चाहे कुछ भी हो।
हर सांस में उस शक्ति का एहसास,
अब जीवन है एक अनमोल प्रवास।
गलतियों से सीखा, आगे बढ़ता चलूँ,
हर अनुभव से कुछ नया पाऊँ।
खुशी और शांति से जीवन भरूँ,
और दूसरों को भी राह दिखाऊँ।
अंधेरे से उजाले की ओर चला हूँ,
अब मैं खुद से ही, खुद को मिला हूँ।
ये राह है लंबी, पर आसान भी है,
बस थोड़ा सा विश्वास रखना होगा।
अपने भीतर के सच को पहचानना होगा,
और फिर हर मुश्किल आसान होगा।
यह जागृति है मेरी, एक नया जीवन,
जो मैंने पाया है, खुद को अर्पण।
कभी कभी लगता है ये सब एक भ्रम है,
पर फिर वो आवाज़ आती है अंदर से।
कहती है, 'तू ही सत्य है, तू ही परम है',
और मैं खो जाता हूँ उस आनंद में।
अब ना कोई डर है, ना कोई चिंता,
बस प्रेम है, और अनंत शांति।
ये कविता नहीं, ये जीवन की सच्चाई है,
जो मैंने खुद जी है, खुद पाई है।
हर मुश्किल में, यही मेरी कमाई है,
और यही मेरी सच्ची राह दिखाई है।
अंधेरे से उजाले की ओर, बस यही है सार,
अपने भीतर ही है, मुक्ति का द्वार।
अब मैं शांत हूँ, और खुश भी हूँ,
क्योंकि मैंने खुद को पहचान लिया है।
और इस खुशी को, मैं बाँटना भी हूँ,
ताकि हर कोई, खुद को जान लिया है।
यही है मेरी प्रार्थना, यही है मेरा ध्यान,
हर दिल में जागे, ये आत्म-ज्ञान।
अंधेरे से उजाले की ओर...हम सब चलें!
और मिलकर, एक नया संसार रचें।
एक अंधेरी गली में भटकता रहा।
मन में सवाल थे, अनगिनत निशान,
हर जवाब से मैं और उलझता रहा।
दुनिया की भागदौड़, झूठी ये शान,
मुझे ले गई थी कितनी दूर कहीं।
हर खुशी में भी एक खालीपन महान,
जैसे कुछ टूटा हो, भीतर कहीं।
फिर एक दिन, अचानक, क्या हुआ मुझको,
एक धीमी सी आवाज़ आई कहीं से।
जैसे कोई पुकारे, धीमे से, चुपको,
'तू है अनमोल,' कहे मुझको, ऐसे।
रोशनी की एक किरण सी जागी,
अंधेरे में भी, एक उम्मीद सी लागी।
धुंधला सा था सब कुछ, जैसे सपना कोई,
पर उस आवाज़ में सच्चाई थी गहरी।
जैसे बरसों से सोया था मैं, खोई,
और अब खुल रही थी आँखें मेरी।
खुद को ढूँढने की प्यास जगी फिर,
हर सांस में एक नई आस जगी फिर।
मंदिरों में ढूँढा, मस्जिदों में भी गया,
पर वो शांति कहीं बाहर ना मिली।
फिर एक दिन, मैं खुद से ही मिला,
अपने भीतर ही वो दुनिया मिली।
बाहर की तलाश थी बस एक धोखा,
सच्चा ठिकाना तो था दिल में ही रोका।
धीरे-धीरे समझ आया, खेल ये सारा,
मैं ही हूँ कर्ता, मैं ही हूँ भोगता।
दुख-सुख का ये चक्र है न्यारा,
इसे समझकर ही जीवन संवरता।
डर, चिंता, सब दूर हुए ऐसे,
जैसे पतझड़ में पत्ते झड़ते हैं जैसे।
अब डर नहीं लगता, अकेलेपन से भी,
क्योंकि जानता हूँ, मैं अकेला नहीं हूँ।
एक शक्ति है, जो जुड़ी है मुझसे सभी,
हर पल साथ है, चाहे कुछ भी हो।
हर सांस में उस शक्ति का एहसास,
अब जीवन है एक अनमोल प्रवास।
गलतियों से सीखा, आगे बढ़ता चलूँ,
हर अनुभव से कुछ नया पाऊँ।
खुशी और शांति से जीवन भरूँ,
और दूसरों को भी राह दिखाऊँ।
अंधेरे से उजाले की ओर चला हूँ,
अब मैं खुद से ही, खुद को मिला हूँ।
ये राह है लंबी, पर आसान भी है,
बस थोड़ा सा विश्वास रखना होगा।
अपने भीतर के सच को पहचानना होगा,
और फिर हर मुश्किल आसान होगा।
यह जागृति है मेरी, एक नया जीवन,
जो मैंने पाया है, खुद को अर्पण।
कभी कभी लगता है ये सब एक भ्रम है,
पर फिर वो आवाज़ आती है अंदर से।
कहती है, 'तू ही सत्य है, तू ही परम है',
और मैं खो जाता हूँ उस आनंद में।
अब ना कोई डर है, ना कोई चिंता,
बस प्रेम है, और अनंत शांति।
ये कविता नहीं, ये जीवन की सच्चाई है,
जो मैंने खुद जी है, खुद पाई है।
हर मुश्किल में, यही मेरी कमाई है,
और यही मेरी सच्ची राह दिखाई है।
अंधेरे से उजाले की ओर, बस यही है सार,
अपने भीतर ही है, मुक्ति का द्वार।
अब मैं शांत हूँ, और खुश भी हूँ,
क्योंकि मैंने खुद को पहचान लिया है।
और इस खुशी को, मैं बाँटना भी हूँ,
ताकि हर कोई, खुद को जान लिया है।
यही है मेरी प्रार्थना, यही है मेरा ध्यान,
हर दिल में जागे, ये आत्म-ज्ञान।
अंधेरे से उजाले की ओर...हम सब चलें!
और मिलकर, एक नया संसार रचें।
About This Story
Genres: Poetry
Description: This sonnet explores the journey from a state of inner darkness and confusion to a gradual awakening of spiritual awareness and peace.