विमानस्थल पर न्याय

By Amit Kumar Pawar | 2026-01-28 | 2 min read

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दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमेशा की तरह चहल-पहल थी। यात्रियों का शोर, ट्रॉली की खड़खड़ाहट, और अनाउंसमेंट की गूंज – सब मिलकर एक अजीब सा माहौल बना रहे थे। मैं, अंजलि, अपनी क्लाइंट, रवि की पत्नी, सीमा के साथ, गेट नंबर 42 के पास बैठी थी। रवि को आज सुबह 8 बजे की फ्लाइट से दुबई जाना था, लेकिन उसे इमिग्रेशन काउंटर पर रोक लिया गया था। उस पर धोखाधड़ी का आरोप था, और पुलिस उसे गिरफ्तार करने वाली थी।

“अंजलि जी, अब क्या होगा? रवि तो बेगुनाह है। ये सब एक साजिश है,” सीमा रोते हुए बोली।

“शांत हो जाओ, सीमा। हम कुछ करेंगे। मैंने जज साहब से बात की है। वो यहीं आ रहे हैं, एक तात्कालिक सुनवाई के लिए,” मैंने उसे तसल्ली दी। मेरा दिल भी डर से धड़क रहा था। जज साहब कब तक पहुंचेंगे? क्या हम रवि को फ्लाइट पकड़ने से पहले बचा पाएंगे?

घड़ी की सुईयां टिक-टिक कर आगे बढ़ रही थीं, जैसे हमारी उम्मीदों को कुचल रही हों। हर गुजरता मिनट एक सदमे की तरह था। मैंने बार-बार जज साहब को फोन किया। “बस निकलने ही वाला हूँ, अंजलि जी। ट्रैफिक बहुत है,” उन्होंने कहा।

आखिरकार, 7:45 बजे, जज साहब हाँफते हुए पहुंचे। उन्होंने तुरंत एक टेबल और कुछ कुर्सियाँ मंगवाईं। हवाई अड्डे के कर्मचारियों और यात्रियों की भीड़ जमा हो गई, सब यह देखने के लिए उत्सुक थे कि क्या हो रहा है। इमिग्रेशन अधिकारी रवि को लेकर आए। वह डरा हुआ और उलझन में दिख रहा था।

सुनवाई शुरू हुई। मैंने रवि की बेगुनाही साबित करने के लिए अपने सारे तर्क रखे। मैंने बताया कि कैसे उसके बिजनेस पार्टनर ने उसे धोखा दिया था और कैसे रवि को फंसाया जा रहा है। मैंने सारे दस्तावेज़ और सबूत पेश किए।

इमिग्रेशन अधिकारी ने अपनी बात रखी। उसने रवि के खिलाफ सबूत पेश किए। माहौल तनावपूर्ण था। हर कोई सांस रोककर देख रहा था।

जज साहब ने दोनों पक्षों को सुना। फिर उन्होंने थोड़ी देर के लिए चुप्पी साध ली। “सबूतों और गवाहों को देखते हुए, मुझे लगता है कि रवि के खिलाफ आरोप कमजोर हैं। मैं उसे रिहा करने का आदेश देता हूँ,” उन्होंने कहा।

सीमा खुशी से चिल्ला पड़ी और रवि को गले लगा लिया। मेरी आंखों में भी आंसू थे। हमने कर दिखाया था। हमने रवि को बचा लिया था।

रवि ने जज साहब और मुझे धन्यवाद दिया। “आप लोगों ने मेरी जिंदगी बचा ली,” उसने कहा।

“तुम्हारे पास फ्लाइट पकड़ने के लिए सिर्फ 10 मिनट हैं,” मैंने उसे याद दिलाया।

रवि भागकर गेट की ओर गया। हमने उसे जाते हुए देखा। वह समय पर फ्लाइट पकड़ने में कामयाब रहा।

मैं और सीमा एक-दूसरे को गले लगाकर रो पड़ीं। यह एक लंबी और थका देने वाली लड़ाई थी, लेकिन हमने जीत हासिल की थी। उस दिन, मैंने सीखा कि न्याय कहीं भी और कभी भी मिल सकता है, भले ही वह एक व्यस्त हवाई अड्डे पर ही क्यों न हो। और कभी-कभी, न्याय पाने के लिए, आपको समय के खिलाफ दौड़ लगानी पड़ती है।

About This Story

Genres: Drama

Description: एक वकील को एक निर्दोष आदमी को बचाने के लिए हवाई अड्डे पर ही एक तात्कालिक अदालत लगानी पड़ती है, और समय उसके खिलाफ है।