बारिश और खिड़की का काँच

By Amit Kumar Pawar | 2026-02-12 | 2 min read

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ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रही थी मैं। बारिश तेज़ हो रही थी, और दृश्य धुंधला सा हो गया था। दिल्ली से गुवाहाटी, एक लंबा सफर था, और अकेलापन काटने को दौड़ रहा था। मैंने हेडफोन लगा रखे थे, पर संगीत में भी मन नहीं लग रहा था। तभी, एक हल्की सी आवाज़ आई। "एक्सक्यूज मी, क्या मैं यहां बैठ सकता हूँ?"

मैंने मुड़कर देखा। एक लड़का खड़ा था, शायद मेरी ही उम्र का, कंधे पर एक बड़ा सा बैग था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। मैंने हां में सिर हिला दिया।

वो लड़का बैठा, अपना बैग ऊपर रैक पर रखा, और फिर मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। "मेरा नाम आर्यन है।"

"मैं मीरा," मैंने कहा, थोड़ी झिझक के साथ।

कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर आर्यन ने कहा, "आप दिल्ली से हैं?"

"हाँ। और आप?"

"मैं कोलकाता से हूँ। गुवाहाटी जा रहा हूँ, अपनी दादी से मिलने।"

बारिश और तेज़ हो गई थी। खिड़की के काँच पर पानी की बूंदें गिर रही थीं, जैसे कोई कहानी लिख रही हों। हमने बातें शुरू कर दीं। छोटी-छोटी बातें, जैसे कि हमें क्या पसंद है, क्या नहीं पसंद है। पता ही नहीं चला कब घंटे बीत गए। आर्यन बहुत ही मिलनसार था, और उसकी बातों में एक अजीब सी ईमानदारी थी। मुझे लग रहा था जैसे मैं उसे बरसों से जानती हूँ।

अगले दिन, सुबह हुई तो बारिश थोड़ी कम हो गई थी। चायवाला आया, और हमने चाय ली। आर्यन ने मेरी चाय में भी चीनी डाली, क्योंकि उसे पता था कि मुझे मीठी चाय पसंद है। मुझे हंसी आ गई। "तुम्हें कैसे पता चला?" मैंने पूछा।

"बस, अंदाजा लग गया," उसने मुस्कुराकर कहा।

दिन भर हमारी बातें चलती रहीं। हमने अपने सपनों के बारे में बात की, अपने डर के बारे में बात की। मुझे लग रहा था जैसे मैं अपनी पूरी ज़िंदगी उस लड़के के साथ बिता सकती हूँ। लेकिन फिर मुझे याद आया कि गुवाहाटी आने वाला है, और हमारा सफर खत्म हो जाएगा।

शाम को, जब ट्रेन गुवाहाटी पहुंचने वाली थी, तो मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं। मुझे डर लग रहा था कि मैं उस लड़के को कभी दोबारा नहीं देख पाऊँगी। आर्यन ने मेरा हाथ थामा। "मीरा," उसने कहा, "मुझे नहीं पता कि ये सब क्या है, पर मैं तुम्हें भूल नहीं पाऊँगा।"

उसने अपनी जेब से एक छोटा सा कागज़ निकाला, और उस पर अपना फोन नंबर लिख दिया। "प्लीज कॉल मी," उसने कहा।

ट्रेन स्टेशन पर रुकी। आर्यन उठा, अपना बैग उठाया, और दरवाज़े की तरफ चल दिया। उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा, और एक आखिरी बार मुस्कुराया। फिर वो भीड़ में गायब हो गया।

मैंने खिड़की से बाहर देखा। बारिश फिर से शुरू हो गई थी। मैंने वो छोटा सा कागज़ अपनी मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया। दिल में एक उम्मीद थी, और एक डर भी। क्या ये सिर्फ एक ट्रेन का सफर था, या कुछ और भी? मैंने अपना फोन निकाला, और आर्यन को कॉल किया। रिंग जा रही थी, और मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। तभी, उसने फोन उठाया। "हेलो?"

"आर्यन?" मैंने कहा, मेरी आवाज़ कांप रही थी।

"मीरा!" उसने कहा, उसकी आवाज़ में खुशी थी। "मुझे पता था तुम कॉल करोगी।"

और उस बारिश में भीगी ट्रेन की खिड़की के काँच पर, मुझे अपनी कहानी लिखी हुई दिख रही थी।

About This Story

Genres: Romance

Description: A chance encounter on a rain-soaked train journey sparks an unexpected connection, testing the boundaries of distance and fate.