रेत की मुट्ठी (Ret Ki Mutthi - A Fistful of Sand)

By Amit Kumar Pawar | 2026-02-04 | 1 min read

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हाथों में रेत की मुट्ठी,
ये वक़्त है, फिसलता हुआ।
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए,
पीछे छूटता, बचपन मेरा।

वो नीम का पेड़ आँगन में,
जिसपे झूले डाला करते थे।
आज भी खड़ा है, वहीं पर,
पर अब, पत्ते भी कम दिखते हैं।

माँ की वो लोरी, कानों में गूंजती,
अब सिर्फ़ यादों का सहारा है।
पिताजी की डांट, प्यार भरी,
अब सिर्फ़ तस्वीरों में समाया है।

वो गलियाँ, जहाँ दोस्तों संग खेले,
अब अनजान सी लगती हैं।
वो चेहरे, जो दिल में बसे थे,
अब धुंधले से दिखते हैं।

वक़्त की मार, हर चीज़ पर,
एक निशान छोड़ जाती है।
कुछ मिटा देती है, कुछ बदल देती है,
एक नई कहानी लिख जाती है।

वो पहली बारिश की बूंदें,
जो चेहरे पर गिरी थीं।
वो पहली मोहब्बत का एहसास,
जो दिल में छुपा था।

वो नौकरी की पहली तनख्वाह,
वो सपनों का पहला घर।
सब वक़्त की रेत में दबे,
पर यादों में अमर।

कभी सोचता हूँ, क्या पाया, क्या खोया?
इस वक़्त के सफ़र में।
कुछ रिश्ते टूटे, कुछ नए बने,
ज़िन्दगी की राहों में।

पर जो भी हुआ, अच्छा ही हुआ,
ये दिल को समझाता हूँ।
वक़्त के साथ बदलना सीखा है,
अब खुद को मनाता हूँ।

ये झुर्रियां, ये सफ़ेद बाल,
ये वक़्त की निशानी हैं।
पर इनमें छुपा है, एक अनुभव,
एक ज़िन्दगी की कहानी है।

अब डर नहीं लगता, वक़्त से,
अब उसे गले लगाता हूँ।
क्योंकि जानता हूँ, ये भी गुज़र जाएगा,
जैसे सब गुज़र जाता है।

बस यही है, रेत की मुट्ठी,
जो धीरे-धीरे फिसलती है।
पर हर कण में, एक कहानी,
एक याद छिपी रहती है।

और जब ये मुट्ठी खाली हो जाएगी,
तो एक नई कहानी शुरू होगी।
वक़्त का पहिया घूमता रहेगा,
ज़िन्दगी चलती रहेगी।

हाथों में रेत की मुट्ठी,
फिर भी, मैं मुस्कुराता हूँ।
क्योंकि जानता हूँ, वक़्त के साथ,
मैं भी बदलता जाता हूँ।
और इस बदलाव में ही,
ज़िन्दगी का सार छुपा है।
रेत की मुट्ठी, गिरती रहेगी,
और मैं देखता रहूँगा, चुपचाप।

About This Story

Genres: Poetry

Description: A poem about the relentless passage of time, felt through the changing landscapes of memory and the bittersweet acceptance of aging.