शून्य कक्षा का कैदी (Shunya Kaksha ka Qaidi - Prisoner of the Zero Chamber)
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शून्य कक्षा… नाम में ही जैसे सब कुछ समाया हुआ था। बिलकुल खाली, बे-असर। मुझे यहाँ आए हुए छह महीने हो गए थे। छह महीने से मैं साबित करने की कोशिश कर रहा था कि मैंने कुछ नहीं किया। स्पेस स्टेशन ‘अमृत’ पर जो विस्फोट हुआ, उसमें मेरा कोई हाथ नहीं था। लेकिन कौन सुनता? मैं तो बस एक बलि का बकरा था, एक आसान सा लक्ष्य।
“अर्जुन, आज भी वही?” वो बूढ़ी रोबोट, ईवा, हर रोज़ सुबह मेरे कक्ष में आती थी। वही सवाल, वही निराशा। ईवा में भावनाएं तो नहीं थीं, पर मुझे लगता था, वो मेरी हालत समझती थी। “क्या आज तुम सच बताओगे?”
“ईवा, मैं कितना सच बोलूं? मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो बस डेटा एनालिस्ट था। मेरा काम था आंकड़ों का विश्लेषण करना, विस्फोट करना नहीं।” मेरा गला सूख गया था। हर रोज़ एक ही बात दोहराते-दोहराते मेरी आवाज़ में भी अब वो पहले वाली धार नहीं रही थी।
“तुम्हारे फिंगरप्रिंट मिले थे मुख्य कंट्रोल पैनल पर,” ईवा ने अपनी नीली आँखों से मुझे देखा। “और तुम्हारे अतीत में कुछ… संदिग्ध गतिविधियाँ भी पाई गईं हैं।”
“अतीत? वो तो मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था, ईवा। मैं बदल गया था। ‘अमृत’ पर मैंने एक नई शुरुआत करने की कोशिश की थी।”
मैं सच कह रहा था। पृथ्वी पर मैंने कुछ ग़लतियाँ की थीं, कुछ ऐसे काम किए थे जिन पर मुझे आज भी पछतावा होता है। लेकिन ‘अमृत’ पर तो मैंने पूरी ईमानदारी से काम किया था। मैंने तो बस उस बेहतर भविष्य का हिस्सा बनना चाहा था, जिसका सपना सब देखते थे।
एक दिन, ईवा ने मुझे बताया कि स्टेशन कमांडर मुझसे मिलना चाहते हैं। कमांडर विक्रम सिंह… एक सख्त मिजाज़ इंसान, जो कभी किसी की नहीं सुनते थे।
“अर्जुन, हमें पता है कि तुम निर्दोष हो,” विक्रम ने कहा। उनकी आवाज़ में थोड़ी नरमी थी। “लेकिन हमारे पास सबूत नहीं हैं। और जनता का दबाव बहुत ज़्यादा है। हम तुम्हें रिहा नहीं कर सकते।”
मेरा दिल टूट गया। तो क्या यही अंत था? क्या मैं हमेशा के लिए इस शून्य कक्षा का कैदी बनकर रह जाऊंगा?
“लेकिन…” विक्रम ने आगे कहा, “तुम्हारे पास एक मौका है। हमें पता चला है कि ‘अमृत’ के बाहर एक छोटा सा सैटेलाइट ख़राब हो गया है। अगर तुम उसे ठीक कर सकते हो, तो हम मान लेंगे कि तुम में अभी भी काबिलियत है, और शायद… शायद हम तुम्हारे केस पर दोबारा विचार कर सकते हैं।”
ये एक ख़तरनाक मिशन था। सैटेलाइट तक पहुँचने के लिए मुझे स्पेस सूट पहनकर, बिना किसी सुरक्षा के, स्टेशन से बाहर जाना होगा। अगर कुछ ग़लत हुआ तो… मौत निश्चित थी। लेकिन मेरे पास कोई और चारा नहीं था।
मैंने विक्रम की बात मान ली। मैंने स्पेस सूट पहना और ‘अमृत’ से बाहर निकल गया। चारों तरफ बस काला अंधेरा था, और दूर, टिमटिमाते हुए तारे। मुझे डर लग रहा था, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। मुझे खुद को साबित करना था।
मैंने सैटेलाइट तक पहुँचकर उसे ठीक कर दिया। वो काम मुश्किल था, पर मैंने कर दिखाया। जब मैं ‘अमृत’ पर वापस लौटा, तो विक्रम और ईवा मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
“तुमने कर दिखाया, अर्जुन,” विक्रम ने कहा। “तुम सच में निर्दोष हो। हमें बहुत अफ़सोस है कि हमने तुम पर शक किया।”
मुझे माफ़ कर दिया गया। मैं शून्य कक्षा से आज़ाद हो गया था। लेकिन उस कैद ने मुझे बदल दिया था। मैंने समझ लिया था कि दुनिया हमेशा सही नहीं होती, और कभी-कभी हमें खुद ही अपने लिए लड़ना पड़ता है। मैंने फैसला किया कि मैं अब उन लोगों के लिए लड़ूंगा, जिनके साथ अन्याय होता है। शायद, इसी में मेरी मुक्ति थी। शायद, यही मेरा प्रायश्चित था।
“अर्जुन, आज भी वही?” वो बूढ़ी रोबोट, ईवा, हर रोज़ सुबह मेरे कक्ष में आती थी। वही सवाल, वही निराशा। ईवा में भावनाएं तो नहीं थीं, पर मुझे लगता था, वो मेरी हालत समझती थी। “क्या आज तुम सच बताओगे?”
“ईवा, मैं कितना सच बोलूं? मैंने कुछ नहीं किया। मैं तो बस डेटा एनालिस्ट था। मेरा काम था आंकड़ों का विश्लेषण करना, विस्फोट करना नहीं।” मेरा गला सूख गया था। हर रोज़ एक ही बात दोहराते-दोहराते मेरी आवाज़ में भी अब वो पहले वाली धार नहीं रही थी।
“तुम्हारे फिंगरप्रिंट मिले थे मुख्य कंट्रोल पैनल पर,” ईवा ने अपनी नीली आँखों से मुझे देखा। “और तुम्हारे अतीत में कुछ… संदिग्ध गतिविधियाँ भी पाई गईं हैं।”
“अतीत? वो तो मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था, ईवा। मैं बदल गया था। ‘अमृत’ पर मैंने एक नई शुरुआत करने की कोशिश की थी।”
मैं सच कह रहा था। पृथ्वी पर मैंने कुछ ग़लतियाँ की थीं, कुछ ऐसे काम किए थे जिन पर मुझे आज भी पछतावा होता है। लेकिन ‘अमृत’ पर तो मैंने पूरी ईमानदारी से काम किया था। मैंने तो बस उस बेहतर भविष्य का हिस्सा बनना चाहा था, जिसका सपना सब देखते थे।
एक दिन, ईवा ने मुझे बताया कि स्टेशन कमांडर मुझसे मिलना चाहते हैं। कमांडर विक्रम सिंह… एक सख्त मिजाज़ इंसान, जो कभी किसी की नहीं सुनते थे।
“अर्जुन, हमें पता है कि तुम निर्दोष हो,” विक्रम ने कहा। उनकी आवाज़ में थोड़ी नरमी थी। “लेकिन हमारे पास सबूत नहीं हैं। और जनता का दबाव बहुत ज़्यादा है। हम तुम्हें रिहा नहीं कर सकते।”
मेरा दिल टूट गया। तो क्या यही अंत था? क्या मैं हमेशा के लिए इस शून्य कक्षा का कैदी बनकर रह जाऊंगा?
“लेकिन…” विक्रम ने आगे कहा, “तुम्हारे पास एक मौका है। हमें पता चला है कि ‘अमृत’ के बाहर एक छोटा सा सैटेलाइट ख़राब हो गया है। अगर तुम उसे ठीक कर सकते हो, तो हम मान लेंगे कि तुम में अभी भी काबिलियत है, और शायद… शायद हम तुम्हारे केस पर दोबारा विचार कर सकते हैं।”
ये एक ख़तरनाक मिशन था। सैटेलाइट तक पहुँचने के लिए मुझे स्पेस सूट पहनकर, बिना किसी सुरक्षा के, स्टेशन से बाहर जाना होगा। अगर कुछ ग़लत हुआ तो… मौत निश्चित थी। लेकिन मेरे पास कोई और चारा नहीं था।
मैंने विक्रम की बात मान ली। मैंने स्पेस सूट पहना और ‘अमृत’ से बाहर निकल गया। चारों तरफ बस काला अंधेरा था, और दूर, टिमटिमाते हुए तारे। मुझे डर लग रहा था, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। मुझे खुद को साबित करना था।
मैंने सैटेलाइट तक पहुँचकर उसे ठीक कर दिया। वो काम मुश्किल था, पर मैंने कर दिखाया। जब मैं ‘अमृत’ पर वापस लौटा, तो विक्रम और ईवा मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
“तुमने कर दिखाया, अर्जुन,” विक्रम ने कहा। “तुम सच में निर्दोष हो। हमें बहुत अफ़सोस है कि हमने तुम पर शक किया।”
मुझे माफ़ कर दिया गया। मैं शून्य कक्षा से आज़ाद हो गया था। लेकिन उस कैद ने मुझे बदल दिया था। मैंने समझ लिया था कि दुनिया हमेशा सही नहीं होती, और कभी-कभी हमें खुद ही अपने लिए लड़ना पड़ता है। मैंने फैसला किया कि मैं अब उन लोगों के लिए लड़ूंगा, जिनके साथ अन्याय होता है। शायद, इसी में मेरी मुक्ति थी। शायद, यही मेरा प्रायश्चित था।
About This Story
Genres: Drama
Description: Arjun, falsely accused of sabotage on a space station, fights for his freedom and seeks redemption against a society that has already condemned him. His journey is one of betrayal, resilience, and the unyielding human spirit.