गुल्ली-डंडा: मिटती यादें

By Amit Kumar Pawar | 2026-03-08 | 1 min read

Story Content

30 साल बाद लौटा हूँ... सब बदल गया। पर वो मैदान... वो तो नहीं बदल सकता!

पर... वो मैदान अब नहीं रहा। एक इमारत बनने वाली है! मेरी यादें मिट जाएंगी?

मैं लड़ने निकला हूँ! अपने बचपन के लिए, उन यादों के लिए... क्या आप मेरा साथ देंगे?

मैदान तो बच गया... पर क्या यादें भी बच पाएंगी? क्या हम फिर कभी गुल्ली-डंडा खेल पाएंगे?

About This Story

Genres: Poetry

Description: शहर बदला, मैं बदला, पर क्या वो मैदान भी बदल जाएगा? बचपन की यादें बचाने की जंग!