हवाई अड्डा कविता: मौन विरोध
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# हवाई अड्डा कविता: मौन विरोध
## प्रथम अंक: अभिव्यक्ति की पुकार
धूप की किरणें, काँच से छनकर,
हवाई अड्डे के फर्श पर नाचतीं।
भीड़ में अकेला, मैं खड़ा,
दिल में एक आग, शब्दों की पुकार।
कागज़ नहीं, कलम नहीं,
आज तो देह ही मेरी कैनवस है।
स्याही नहीं, पर भावना गहरी,
लिखूंगा आज, एक मौन कहानी।
(एक लंबी साँस लेकर, मैंने कमीज़ उतारी। ठंडी हवा झोंके की तरह लगी, जैसे साहस की फुसफुसाहट हो।)
## द्वितीय अंक: शब्दों का नृत्य
पहला अक्षर उभरा, धीरे-धीरे,
'अ' से 'अग्नि', 'अ' से 'अश्रु'।
दूसरा, तीसरा, फिर पूरी पंक्ति,
कविता बनी, मेरे तन पर।
लोग रुके, कुछ हैरान, कुछ क्रोधित,
कुछ में जिज्ञासा, कुछ में डर।
उनकी आँखें प्रश्न पूछतीं,
पर मेरे शब्द तो मौन थे।
(एक महिला ने अपनी बच्ची को मेरी ओर देखने से रोका। एक आदमी ने गुस्से से कुछ कहा। पर एक युवा जोड़ा, मेरे पास आकर खड़ा हो गया, आँखों में समर्थन लिए।)
मैंने लिखा, 'शांति', 'प्रेम', 'सत्य',
हर अक्षर में, अपना जीवन डाला।
हवाई अड्डा एक मंच बन गया,
मेरी कविता, सबका दर्पण बन गई।
## तृतीय अंक: मौन का परिणाम
फिर आए वे, वर्दी में सजे,
कानून के रक्षक, कर्तव्य के बंधन में।
"यह क्या कर रहे हो?" उन्होंने पूछा,
पर मेरे पास, कोई जवाब न था।
(मैंने सिर्फ अपनी कविता की ओर इशारा किया। उन्होंने मुझे हथकड़ी लगाई। भीड़ में विरोध की हल्की फुसफुसाहट उठी।)
जेल की कोठरी, ठंडी और एकाकी,
पर मेरे शब्द, अभी भी मेरे साथ थे।
देह पर लिखी कविता, मिट नहीं सकती,
वह तो दिल में उतर गई थी।
बाहर, हवाई अड्डे पर, जीवन चल रहा था,
विमान उड़ रहे थे, लोग आ रहे थे, जा रहे थे।
पर मेरी कविता, वहाँ रह गई,
एक मौन विरोध, एक सवाल बनकर।
(मैंने अपनी उंगलियों से, जमीन पर 'आशा' लिखा। भले ही मैं यहाँ बंद था, पर उम्मीद अभी भी बाकी थी।)
मेरी देह, एक कविता बन गई। क्या यह विरोध सार्थक था? शायद। या शायद नहीं। पर मैंने अपनी भावना व्यक्त की। और शायद, किसी के दिल में, एक बीज बो दिया।
## प्रथम अंक: अभिव्यक्ति की पुकार
धूप की किरणें, काँच से छनकर,
हवाई अड्डे के फर्श पर नाचतीं।
भीड़ में अकेला, मैं खड़ा,
दिल में एक आग, शब्दों की पुकार।
कागज़ नहीं, कलम नहीं,
आज तो देह ही मेरी कैनवस है।
स्याही नहीं, पर भावना गहरी,
लिखूंगा आज, एक मौन कहानी।
(एक लंबी साँस लेकर, मैंने कमीज़ उतारी। ठंडी हवा झोंके की तरह लगी, जैसे साहस की फुसफुसाहट हो।)
## द्वितीय अंक: शब्दों का नृत्य
पहला अक्षर उभरा, धीरे-धीरे,
'अ' से 'अग्नि', 'अ' से 'अश्रु'।
दूसरा, तीसरा, फिर पूरी पंक्ति,
कविता बनी, मेरे तन पर।
लोग रुके, कुछ हैरान, कुछ क्रोधित,
कुछ में जिज्ञासा, कुछ में डर।
उनकी आँखें प्रश्न पूछतीं,
पर मेरे शब्द तो मौन थे।
(एक महिला ने अपनी बच्ची को मेरी ओर देखने से रोका। एक आदमी ने गुस्से से कुछ कहा। पर एक युवा जोड़ा, मेरे पास आकर खड़ा हो गया, आँखों में समर्थन लिए।)
मैंने लिखा, 'शांति', 'प्रेम', 'सत्य',
हर अक्षर में, अपना जीवन डाला।
हवाई अड्डा एक मंच बन गया,
मेरी कविता, सबका दर्पण बन गई।
## तृतीय अंक: मौन का परिणाम
फिर आए वे, वर्दी में सजे,
कानून के रक्षक, कर्तव्य के बंधन में।
"यह क्या कर रहे हो?" उन्होंने पूछा,
पर मेरे पास, कोई जवाब न था।
(मैंने सिर्फ अपनी कविता की ओर इशारा किया। उन्होंने मुझे हथकड़ी लगाई। भीड़ में विरोध की हल्की फुसफुसाहट उठी।)
जेल की कोठरी, ठंडी और एकाकी,
पर मेरे शब्द, अभी भी मेरे साथ थे।
देह पर लिखी कविता, मिट नहीं सकती,
वह तो दिल में उतर गई थी।
बाहर, हवाई अड्डे पर, जीवन चल रहा था,
विमान उड़ रहे थे, लोग आ रहे थे, जा रहे थे।
पर मेरी कविता, वहाँ रह गई,
एक मौन विरोध, एक सवाल बनकर।
(मैंने अपनी उंगलियों से, जमीन पर 'आशा' लिखा। भले ही मैं यहाँ बंद था, पर उम्मीद अभी भी बाकी थी।)
मेरी देह, एक कविता बन गई। क्या यह विरोध सार्थक था? शायद। या शायद नहीं। पर मैंने अपनी भावना व्यक्त की। और शायद, किसी के दिल में, एक बीज बो दिया।
About This Story
Genres: Poetry
Description: एक युवा कलाकार की कहानी जो हवाई अड्डे पर अपने शरीर पर कविता लिखकर विरोध करता है, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं और उसके कार्यों के परिणाम को दर्शाता है।